#HOLI IMPORTANCE IN KRISHNA"S CITY OF DWARKA

       कृष्ण की नगरी द्वारका में होली महोत्स्व      




  अहमदाबाद से द्वारका लगभग बस से 12  घंटे का सफर है। रात के समय सफर में बहुत ठण्ड का अहसास होता है। जब बस से सफर कर रही थी तो सोते समय ठण्ड के कारण कपकपी बंध  रही थी क्योंकि हम सफर में कोई गर्म कप.ड़ा लेकर नहीं गए थे।   जब द्वारका पहुंचे तब दोपहर के समय इतनी ज्यादा गर्मी लग रही थी कि हम सोच रहे थे  धूप में खड़े होकर क्यों इंतजार कर रहे है।
         हमने उसी दिन दोपहर में घूमने के लिए गाड़ी बुक करवा रखी थी। जिसके कारण हमने तैयार होकर सबसे पहले द्वादस ज्योतिर्लिंग नागेश्वर के दर्शन करने निकल पड़े। वह  बहुत अच्छी जगह था। इसकी मान्यता बहुत है। इसमें पूरे  दिन दर्शन किये जा सकते है। ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
       यहाँ के प्रसाद बेचने वाले प्रसाद बेचते वक्त पोस्टर लगा के रखते है" भगवान के चरणों में चढ़ा हुआ प्रसाद है।" मेने पहले जहाँ  से प्रसाद लिया तब  इस तरफ  ध्यान नहीं गया। बाद में अन्य दुकान पर इस वाक्य को पड़ा तो विशेष रूप से दोबारा प्रसाद ले लिया। बाद में ध्यान से देखने पर अहसास हुआ हर दुकान दार  ने ऐसे पोस्टर लगाए हुए है।
             गुजरात में दिल्ली की तरह सड़को पर ट्रैफिक जाम  की समस्या बहुत कम होती है। यहाँ  पर ट्रेफिक सिग्नल के  स्थान पर  गोल चककर  बने होते है  वहाँ  के लोगो को उसकी आदत होती है। मजेदार बात तो वहाँ  लगी जब मेने सिग्नल पर लोगो को लाइट के हिसाब से गाड़ी चलाते  हुए नहीं देखा जबकि सिग्नल के पास ही ट्रेफिक पुलिस खड़ी  हुई थी। हमारे चालक  ने जब कहा -यहाँ जाम  ज्यादा देर के लिए नहीं लगता इसलिए किसी को ज्यादा बुरा नहीं लगता सब अपनी बारी का इंतजार सब्र से करते रहते है।
     गोपी तालाब और रुक्मणि मंदिर प्रसिद्ध स्थान है। इन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। गुजरात हिन्दुओं का तीर्थ स्थान होने के बाबजूद मंदिर का निर्माण कार्य उत्कृष्ठ  किस्म का नहीं है। बल्कि लगता है इनका उद्धार किया जाना चाहिए। यहाँ पर आधे- अधूरे का अहसास होता है।
       भेंट द्वारका समुद्र के बीच बना हुआ है। हमें भरी दोपहर में वहाँ  जाने का मौका मिला। हमारे गाइड ने चार बजे मंदिर के खुलने के बारे में बताया। हम लगभग तीन बजे पहुंच गए थे।भेंट द्वारका तक पहुंचने के लिए नाव से जाना पड़ता है। ये नावे ऊपर से खुली होती है जिसके कारण धूप असहनीय हो रही थी। लेकिन इस नाव के चलने पर हमारे चारो तरफ पक्षी खाने के लालच में उड़ने लगे मैने इससे पहले इतनी अधिक संख्या में निडर पक्षी इतने करीब से नहीं देखे थे। पक्षी खाने के समान को हवा में ही लपक लेते थे। उनका कार्यकलाप मन को मोह रहा था।   हम चार बजे के हिसाब से लाइन में लग गए। लाइन में खड़े होने पर पता चला वह मंदिर पांच बजे खुलता है। लगभग डेढ़ घंटे धक्का -मुक्की सहते हुए हमने इंतजार किया। हम होली पर द्वारका पहुंचने के कारण हर जगह भीड़ का सामना कर रहे थे क्योंकि कृष्ण की नगरी होने के कारण सारी द्वारका कृष्ण मय  हो रही थी।
      मुझे सुनकर बहुत हैरानी हुई जब लोगो ने बताया यहाँ के लोग लगभग 20 दिनों से पैदल द्वारका पहुंचने के लिए पुरे परिवार सहित निकले है। हमने रास्ते में बहुत सारी जगह सोने के लिए  रैन बसेरे देखे थे।ये लोग बहुत गरीब थे जिनके लिए खाने और सोने का इंतजाम भी सरकार या दूसरी संस्थाए करती है
        हमारा होटल ठीक उस जगह था जहाँ  मुख्य द्वारका मंदिर  है। उसी जगह मेला लगता था। मेला सुबह से रात  तक लगा रहता था। जब हम सुबह सोकर उठे तब भी लोग झुण्ड बना कर मेले का आनंद ले रहे थे। जब सोने गए तब भी मेले में उतनी ही चहल -पहल थी।

          आपने कभी कृष्ण लीला रात  भर  नहीं देखी  होगी लेकिन मेने लोगो को खुले में बिना किसी सहूलियत के श्रद्धा भाव से  रास लीला का आनंद लेते देखा। मै  उनका भक्तिभाव देख कर विभोर   हो गयी।
      होली वाले दिन लोगो का उत्साह संभाले नहीं सम्भल रहा था। द्वारकाधीश मंदिर में प्रत्येक दर्शनार्थी को कान्हा से होली खेलने के लिए गुलाल दिया गया था लेकिन कान्हा हमसे होली खेलने कैसे आते  हमने आपस में होली का मजा लिया लेकिन मंदिर में होली खेलते हुए हमें ऐसा अहसास हो रहा था कान्हा हमारे बीच  में है।
      द्वारका में होली का मजा दुगना हो गया था।

#somnath tirth on tha quiet seashore

              शांत समुद्री किनारे पर सोमनाथ तीर्थ 

 
  सोमनाथ  गुजरात में समुद्र के किनारे बसा हुआ है। यहाँ की आबादी बहुत कम है। यहाँ पर छोटे पानी के जहाज बनते है। इस जगह पर रुके हुए पानी की गंध फैली रहती है। लकड़ी के बड़े -बड़े जहाज बनते दिखाई देते है।
     इसे देखकर लगता है मोह्हमद गजनी ने इसे इतनी बार लूट कर इसकी भव्यता और गरिमा को कम करने की कितनी बार  कोशिश की लेकिन यह आज भी सिर  ऊँचा करके खड़ा है।
     सोमनाथ भगवान  शिव के बारह  ज्योतिर्लिंग में से एक है। इस जगह की भव्यता देखते ही बनती है। अदभूत वास्तुकला ,हरियाली और समुद्री किनारे को निहारना मन को भाता है। सोमनाथ मंदिर  में जाते समय आपका मोबाईल ,बेल्ट  और सभी तरह के बैग  बाहर ही जमा करवा लिए जाते है। इसकी सुरक्षा का विशेष इंतजाम किया गया है।
      मेने ठन्डे पेण्ट के बारे में सुना था लेकिन इसका प्रयोग केवल गुजरात में होते देखा। यदि आप किसी मंदिर में जाओ तब गर्म फर्श की तपन से बचने के लिए कुछ पट्टियां  सी बिछा दी जाती है और कही उन्हें ठंडा रखने के लिए उनपर पानी का छिड़काव भी कर दिया जाता है लेकिन वे  पट्टियां  भी धुप से गर्म होती है। उनपर चलते हुए लगता है जैसे उबलते पानी में पैर चला गया है लेकिन ठन्डे पेंट की लाइनों पर चलते हुए तपिश महसूस नहीं हुई जबकि थोड़ा पैर इधर या उधर करते ही गर्मी का अहसास हो जाता था।
       सोमनाथ मंदिर में पूरे दिन दर्शन सुलभ है ,यहाँ  दिन में तीन समय भव्य आरती का आयोजन किया जाता  है पुराने समय में आरती के समय देवदासी नृत्य प्रस्तुत करके इसकी भव्यता बढ़ाती थी। अब देवदासियों के आभाव में इसके प्रभाव में कोई कमी दिखाई नहीं देती।
       इसमें आरती को भव्य रूप देने के लिए महंगे साउंड सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग के चारो तरफ सुनहरी ( सोने के रंग ) सजाया हुआ मंदिर आँखों को चकाचोंध कर देता है। उसकी दिव्यता सोचने पर मजबूर कर देती है। हम इसी दुनिया में है या कही दुनिया बदल गयी है। आरती लाइन में लगकर देखी जा सकती है। लाइन में लगकर जब तक में उसे देख सकती थी देखी उसके बाद जब मुझे बाहर जाने के लिए कहा गया तो मै उसे देखने का प्रलोभन छुपा नहीं सकी। लाइन में से निकल जाने के बाद भी एक कोना ढूंढ कर पूरी आरती का रसास्वादन लेने से नहीं चुकी।
        हम रात  7 बजे की आरती में शामिल हुए थे। बाहर निकलने पर अँधेरा छाया हुआ था लेकिन ठंडी हवा चल रही थी। मंदिर की भव्यता और ठंडक वहाँ  से उठने नहीं दे रही थी।
       यहाँ हर मंदिर में औरतो और मर्दो की अलग लाइन होती है। कुछ समय बाद मेरे साथी ने आकर पूछा लाइट और साउंड कार्यक्रम देखना है। मुझे उसे देखने की इच्छा प्रबल हो उठी।
        मंदिर के पास ही बहुत सारी बैठने के लिए पत्थर की सीटे बनी हुई थी जिनपर एक साथ लगभग पांच सौ लोग बैठ सकते थे। मंदिर में नहीं लग रहा था इतने अधिक लोग आये है लेकिन इस कार्यक्रम के समय सारी सीट भर गयी थी। .
      सोमनाथ में बहुत गर्मी रहती है लेकिन इस मंदिर में गर्मी का बिलकुल अहसास नहीं हुआ। इस मंदिर के चारो और गलियारा बना हुआ है जिसके ऊपर शेड बने हुए है जहां से समुद्र को निहारा जा सकता है। उसे देखते हुए कितना समय व्यतीत हो गया पता नहीं चला  .
      गलियारे में चलते हुए कब मुख्य द्वार आ गया अहसास नहीं हुआ। इस गलियारे में आगे चलकर शिवजी के सभी ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित तस्वीरें बनी हुई है इसके आलावा विस्तार से लिखा हुआ है। इसे नया सोमनाथ कहा जाता है।
       इसके पास ही पुराना  सोमनाथ मंदिर बना हुआ है। वह केवल एक मंदिर का अहसास कराता है यहाँ पर मांगने के लिए अनेक पुजारी और भिखारी बैठे हुए है। उनका मांगने का तरीका मन में खीझ पैदा करता है।
      सोमनाथ मंदिर से एक रास्ता समुद्र तक जाता है। इस रास्ते  के दोनों ओर दुकाने बनी  हुई है। यहां पर आप खरीदारी कर सकते हे। अनेक नारियल पानी की दुकाने खुली हुई है जहाँ बैठ कर नारियल पानी पीते हुए समुद्र का नजारा देख सकते है।
     समुद्री किनारे पर कुछ लोग स्नान कर रहे थे तो कुछ हमारी  तरह उन्हें देख कर लुत्फ उठा रहे थे। समुद्र में क्रीड़ा करने वाले कम थे लेकिन किनारे पर घोड़े और ऊँट की सवारी करने वाले बहुत थे।
       ऊंट की सवारी के समय जब वह खड़ा होता है या बैठता है तो पूरी तरह झुक जाता है यदि कस कर पकड़ा न हो तो बहुत बुरी तरह मुँह के बल गिरने का डर रहता है। ऊंट बहुत ज्यादा हिलता है जिसके कारण उस पर पूरे समय ढंग से कस  कर बैठना जरूरी होता है।
      इस हिन्दू तीर्थ के समुद्री किनारे पर भिन्न समुदाय के लोगो को देखकर हैरानी हो रही थी। हम यहाँ बड़ी होली वाले दिन गए थे लेकिन शिवजी का तीर्थ होने के कारण होली का अहसास ही नहीं हुआ। हर तरफ शिवजी की छाया फैली दिखाई  दे रही थी।
      यहाँ के खाने में आपको दिल्ली का स्वाद  मिल जाता है। दुकानदारों से कारण पूछने पर उन्होंने कहा -यहाँ केवल गुजराती ही नहीं पूरे भारत से लोग आते है। इसलिए हम हर तरह के यात्रियों के लिए खाना बनाते है। मेरा  दक्षिण भारत से आये लोगो से भी सामना हुआ।
      सोमनाथ बहुत छोटी जगह में बसा हुआ है। यहाँ एक दिन में सभी जगहो को देखा जा सकता है। यदि शांति की तलाश में आये तो बेहद शांत जगह है। इसके  रेलवे स्टेशन पर केवल चार गाड़ियां शाम के समय आती है। बाकी समय रेलवे स्टेशन खाली और सुनसान रहता है। अधिकतर लोग बस से दूसरे शहरों में जाते है।
      हर तरफ ऑटो घूमते दिखाई देते है। लगभग कुछ घंटो में सारे दर्शनीय स्थान देखे जा सकते है। लेकिन यहाँ के लोग बहुत मिलनसार है। उनमे चालाकी नहीं है। जो आज के समय में मन को मोह लेती है।

#adalaj ki bab(wonderful sacrifice saga)

                 अडालज  की बाब उर्फ़ त्यागमय अदभूत  बलिदान 



 अहमदाबाद में अडालज  की बाब वास्तुशास्त्र के हिसाब से  बेहद  सूंदर बाबड़ी है।  इसके निर्माण की कहानी मन को सोचने पर मजबूर कर देती है।क्या सच में  कोई रानी जनता की भलाई के लिए इस सीमा  तक त्याग कर सकती है। हमारा इतिहास त्याग और बलिदान की कहानियो से भरा हुआ है। महमूद बेगड़ा ने अहमदाबाद पर आक्रमण करने के बाद राजा को मौत  के घाट उतार  देने के बाद रानी से विवाह करने की ख्वाहिश जताई।
        तब रानी ने कहा "-मेरे पति ने ये बाब बनाने का बीड़ा उठाया था। यदि तुम इस बाब को पूरा कर दोगे  तब मै  तुमसे विवाह कर लुंगी। "
    उसकी शर्त सुनकर बेगड़ा को गुस्सा आया लेकिन उसने रानियों के जौहर करने की खबरे सुन रखी थी। इसलिए उसे ख़ुशी हुई कि  ये रानी आत्मदाह करने की जगह केवल शर्त रख रही है। जो पूरा करना मुश्किल नहीं है। उसने ख़ुशी -ख़ुशी काम को पूरा करवाना शुरू कर दिया।
       हर तरफ रानी के विवाह की चर्चा होने लगी। उसके ऊपर अनेक लांछन भी लगाए जा रहे थे। लेकिन बाबड़ी का निर्माण कार्य भी जोर -शोर से चल रहा था।
        आखिर काम पूरा हो गया। तब बेगड़ा ने रानी से शादी करने की बात चलाई। अब रानी उसका विरोध नहीं कर सकती थी।
   रानी  सोलह श्रृंगार करके दुल्हन के समान तैयार हुई और किले की छत से कूद कर आत्माहुति दे दी। उससे पहले उसने महमूद बेगड़ा के नाम खत लिख कर अपना मंतव्य जाहिर कर दिया -"मै उसी दिन मर गई थी जिस दिन मेरा पति युद्ध में शहीद हुआ था। मेने आपसे शादी इसलिए स्वीकार की थी  मै बाबड़ी का काम पूरा होते देखना चाहती थी। यदि मै उसी समय मर जाती तब  बाबड़ी का काम भी रुक जाता। मै  इस काम को अधूरा नहीं छोड़ना चाहती थी। "
      रानी की ऐसी शहादत इससे पहले सुनने में नहीं आयी थी। जो औरत  मरने का प्रण कर चुकी थी वह किस तरह प्रत्येक दिन तिल -तिल करके मरती होगी लेकिन जनता की भलाई के लिए सांसे लेने के लिए बाध्य थी।
      इसकी कहानी दिल को बेध  जाती है। लेकिन निर्माण कला मन को हर लेती है। ये बाब पांच मंजिला है। इसकी हर मंजिल बहुत सूंदर वास्तु  चित्रों  से उकेरी गई है। हर मंजिल ठंडक का अहसास दिलाती है। ये पहली बाब है  जो वास्तु कला का अद्भुत नमूना ही नहीं बल्कि जिस मकसद से इसका निर्माण किया गया था उसे भी सार्थक करती है अर्थात इसमें पानी भी भरा हुआ है। सुखी हुई नहीं है। लोग इसमें कूद कर खुदकशी का प्रयास न करे इसलिए इसे जाल से ढक दिया गया है। एक जाल ठीक पानी के ऊपर बनाया गया है। दूसरा पांचवी मंजिल के ऊपर बनाया गया है जिससे सुंदरता तो निहारी जा सके लेकिन आपत्तिजनक काम न किया जाये।
    दिल्ली की उग्रसेन की बाबड़ी इसके सामने अधूरी लगती है। अडालज की बाब के अंदर जाने के लिए तीन तरफ से रस्ते है। इसके अंदर जाने के तीनो रास्ते नक्काशीदार बने है  .यह दिल्ली की बाबड़ी से लगभग तिगुनी बड़ी है। इसमें सफाई का विशेष ध्यान रखा गया है। कही भी बैठ  कर काम किया जा सकता है। यह इस तरह से बनाई गयी है कि इसमें  छाया रहती है। हमने दोपहर के समय इसमें प्रवेश किया था। लेकिन बहुत सारी  जगह छायादार थी।
       इसमें मनोरंजक कार्य की प्रस्तुति के लिए रंगमंच भी बना हुआ था। ये इतनी विशाल है की इसमें सेंकडो लोग समा  जाये। इसमें कई स्थानों पर छोटे छोटे कमरे भी बने हुए है। जिसे देखकर लगता है  जैसे किसी पर्दानशी के बैठने के लिए बनाये गए है।
         इसे देखने के लिए दूर और पास हर जगह से लोग आते है। मेने यहाँ पर हर उम्र के लोगो का हुजूम देखा है। जिसे देख कर लोगो के मन नए उत्साह से भर उठते है। यहाँ का हर कोना  सुंदरता का बेजोड़ नमूना है। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...