#THE GRANDEUR OF TUSSAUDS MUSEUM

               तुसाद संग्रहालय की भव्यता  



  मेडम  तुसाद के बारे में मुझे बहुत पहले से पता था। लेकिन इनका संग्रहालय विदेश में होने के कारण में इसे देखने में असमर्थ थी। लेकिन इसकी ख्याति और वैक्स  (मोम ) की मूर्तियाँ इसे देखने की इच्छा को मरने नहीं देती थी। जब से भारतीय कलाकारों की मूर्तियाँ  यहाँ लगने लगी और उनके उद्घाटन की खबरे जब भी सुनती थी अपने पर अंकुश लगाना बहुत मुश्किल हो जाता था।
      मेडम तुसाद शुरू  मे अपनी मूर्तियाँ की नुमाइश अनेक देशो में ले जाकर  करती थी। जब ये प्रसिद्ध हो गयी तो इन्होने अपना संग्रहालय लंदन में बनाया। उसकी प्रसिद्धि देश -विदेश में फैल गई। उसके बाद दर्शक खुद लंदन उसका संग्रहालय देखने  के लिए वहाँ पहुँचने लगे। इसके बाद इन्होने अन्य देशो में संग्रहालय खोले।
        जब एक दिसंबर को कनॉट प्लेस में पुराने रीगल सिनेमा के पास  तुसाद का संग्रहालय खुला तो मुझे मन मांगी मुराद मिल गयी। में समय मिलते ही वहाँ पहुँच  गयी। यहाँ की टिकट 960  रु  की है। भारत के हिसाब से बहुत ज्यादा है। यदि टिकट खिड़की से लोगो तो इतने पैसे लगेंगे लेकिन इंटरनेट से खरीदने पर इसकी कीमत 760  रूपये है। पूरे २०० रु का अंतर् रखा गया है।
      इसके अंदर प्रवेश करते ही प्रकाश व्यवस्था अद्वितीय है। हल्का -हल्का प्रकाश अनेक कोणों  से आता  है यहाँ मद्धिम रौशनी में इन मूर्तियों को देखने का मजा कुछ और ही है। साथ ही धीमा संगीत चल रहा होता है किसी तरह की गहमा -गहमी नहीं है।
         इन मूर्तियों को छूने की सुविधा है। जिसके कारण में इन्हे छूने की इच्छा रोक नहीं सकी। लेकिन छूने पर मुझे ये शुद्ध मोम जैसी नहीं लगी बल्कि साधारण मूर्तियों की तरह सख्त प्रतीत हुई। इनको पहनाये गए कपड़े सही  है। ये कपड़े ख्याति प्राप्त लोगो ने दिए है। इनकी ऊचाई और लम्बाई बिलकुल सही है लेकिन चेहरा उस इंसान से हूबहू नहीं मिलता  मुझे उनके नाम देखकर सही अंदाजा हुआ।  रणबीर कपूर और अनिल कपूर की मूर्तियाँ बहुत अच्छी लगी।
    इन मूर्तियों के साथ फोटो खिचवाई जा सकती है. राष्ट्रपति   अब्दुल कलाम  और प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की प्रतिमा भी बहुत अच्छी बनी  हुई है। सभी मूर्तियों पर कई कोणों  से प्रकाश फेंका गया है। कई जगह मूर्ति पर सही रौशनी है। लेकिन गलत दिशा से फोटो खींचने लगोगे तो मूर्ति अच्छी और आपकी तस्वीर अँधेरे में डूबी आएगी।फोटो खिचवाने की सुविधा के कारण लोग अनेक कोणों  से फोटो खिचवाने में लगे थे। उन्हें देखकर हमे भी सेलिब्रिटी से मिलने का एहसास हो रहा था।
       यहाँ केवल देशी कलाकारों की ही नहीं बल्कि विदेशी लोगो की मूर्तियाँ भी लगी हुई थी। उनके साथ खड़े होने पर पता चला भारतीय कितने छोटे कद के होते है  .निकोल किडमैन 6  फिट से ज्यादा कद  की है  वही  एंजलीना जोली भी बहुत लम्बी लगी।
      यदि एक अद्भुत अहसास पाने की आपको ललक है  तो यहाँ  अवश्य जाइये। 

#NOIDA'S DALIT MEMORIAL PARK BETWEEN MODERNITY

      आधुनिकता के बीच  नोएडा का दलित स्मारक पार्क 

 पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के द्वारा बनबाया हुआ दलित समारक पार्क देखने में बहुत अच्छा  है। इसका बृहद स्वरूप मन को भाता है।  इसके पांच द्वार बने है लेकिन अंदर जाने की इजाजत केवल पांचवे नंबर के द्वार से है। इसके अंदर जाने का शुल्क मात्र 15  रु  है। जो इसकी भव्यता के सामने नगण्य है। इसमें प्रवेश करते ही बहुत सुंदर पक्का फर्श बना है। जिसपर बहुत सारे  लोग घूम रहे थे। इस पर चलते हुए मुझे भी बहुत अच्छा  लग रहा था। चलते हुए थक  जाने पर अनेक स्थानों पर स्टील की बेंचेस लगी हुई थी। जिनपर अनेक लोग बैठे हुए थे।
       एक समूह यहाँ पर पिकनिक मनाने आया हुआ था। वे लोग घर से बैठने का समान साथ लाये हुए थे। उनके पास घर से लाया हुआ खाने का समान था। उन्हें देखकर लग रहा था लगभग 30 लोगो की पार्टी करने की अच्छी जगह  है। यहाँ पर खाने  का सामान नहीं मिलता जबकि अनेक स्थानों पर केंटीन लिखा जरूर हुआ है। हम केंटीन ढूंढने के लिए 2  द्वार आगे तक गए लेकिन हमे निराशा हाथ लगी। बाहर भी खाने का सामान बेचने के लिए एक दो खोमचे वाले खड़े दिखाई दिए। 
          द्वार से हमे दोनों तरफ विशाल   फव्वारे  दिखाई दे रहे थे । जिसका बृहद आकर हमे अपनी तरफ खींच रहा था। लेकिन रास्ते  में बने हुए विशाल हाथी वही रुकने पर मजबूर कर रहे थे। इनकी संख्या 20  है। ये द्वार के दोनों और हमारा स्वागत करते प्रतीत हो रहे थे। उनके बीच  से चलते हुए हम फव्वारे  तक पहुंचे।  ये   कांस्य का बना हुआ अपनी विशालता में अद्भुत था।  यहाँ भी हाथी  की सूंड में से पानी का निकलना मन को भा  रहा था। शाम के समय अलग -अलग कोनो से फव्वारे पर पड़ने वाली रौशनी मन को लुभा रही थी। इसमें अनेक स्थानों से पानी निकलता है। जिसकी आम  लोग कल्पना नहीं कर  सकते। फव्वारे के पास से चारो और देखना अद्भुत लग रहा था। इसके चारो और से उतरने के लिए सीढिया  बनी हुई है। हर तरफ से अलग ही नजारा दिखाई देता है।
        यहाँ से उतरने के बाद हम हरीभरी जगह पर जाकर बैठ गए। यहाँ छुट्टी का मजा लेने के लिए अनेक परिवार अपने बच्चो के साथ आये  हुए थे। यहाँ बच्चे अपने खिलोनो के साथ उछलते कूदते घूम रहे थे। बड़े लोग एक तरफ बैठ कर नज़ारे का लुत्फ़ उठा रहे थे। उन्हें देखकर लग रहा था बड़े शहरो के छोटे -छोटे घरो में घूमने , दौड़ने और भागने की जगह के अभाव  में बच्चे आलसी  होकर दूरदर्शन के सामने से उठते नहीं उन्हें यदि चुस्त बनाना है तो अभिभावकों को भी उनके साथ इन जगहों पर आना चाहिए तभी उनकी नटखटता का पता चलेगा।
      इसके बीच  में मायावती ,काशीराम और अम्बेडकर जी से जुडी हुई यादें महफूज की गयी है  दीवारों पर उनसे सम्बन्धित अनेक चित्र उकेरे गए है। स्मारक के बीचोबीच इन तीनो की विशाल मूर्तियाँ  लगी हुई है उन्हें देखकर लगता है मानो बोल उठेंगी। उन्हें देखकर लगता है भारत में मूर्तिकला, प्राचीनकाल में ही नहीं बल्कि  आधुनिक काल  में भी  अपनी भव्यता बिखेरने में सक्षम है।
       इसमें प्रकाश  आने के लिए प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों का अद्भुत सामजस्य दिखाई देता है। सीधे तौर  पर कृत्रिम रौशनी का प्रयोग नहीं किया गया बल्कि रौशनी बिखरती तो दिखाई देती है लेकिन स्त्रोत ढूंढना पड़ता है कि ये प्रकाश निकल कहाँ  से रहा है।
      हरियाली में बेकार में जाकर उसकी सुंदरता को बर्बादी से बचाने  के लिए इसके चारो और पक्का गलियारा बनाया गया है इस पूरे  बगीचे को बनाने  के लिए  बहुत सूंदर पत्थर का इस्तेमाल किया गया है।  ये पार्क बहुत बड़ा है इसे पूरा   घूमने के लिए  आधुनिक लोगो की सामर्थ्य पर शक होता है  गाड़ियों के समय में अपने पैरो  से विरले ही घूम सकेंगे। क्योंकि आधुनिक समय में लोगो का गाड़ियों के राज में पैदल चलना बहुत कम  हो गया है।
      यदि आधुनिक समय में बनने वाले अद्भुत पार्क का  नजारा देखना चाहते हो तो नोएडा  के दलित समारक पार्क में एक बार जरूर आना चाहिए क्योंकि दिल्ली में ऐसे पार्क बहुत कम  है। जहाँ पुरे साल जन  साधारण जा सके. यहाँ आने के लिए सुबह  से शाम पांच बजे तक टिकट मिलती है। उसके बाद बंद हो जाती है। यानि केवल पांच बजे तक प्रवेश दिया जा सकता है।
      बड़ी -बड़ी बिल्डिंगो के बीच  बना मनोहर पार्क सुकून का अहसास कराता  है। यहाँ  प्रकृति से जुड़ने और खुले आसमान के नीचे  आधुनिकता के बीच  आराम के दो पल बीताने  के लिए यहाँ  जरूर आना चाहिए।  

#MANIPUR IS A UNIQUE STATE

   

                                   मणिपुर   मेरी नजर  से 

बाकी  भारत से उत्तर -पूर्व का इलाका बिलकुल अलग -थलग है। वहाँ के बारे में अधिकतर भारतीयों को बिलकुल जानकारी नहीं है। उस इलाके में जाने के बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता वहाँ के लोगो और वातावरण के बारे में डर समाया  रहता है। जैसे पहले समय में काला पानी (अंदमान -निकोबार ) के बारे में सजायाफ्ता कैदी दिमाग में आ जाते थे। वैसे ही इन राज्यों के बारे में सारे नक्सलवादी या आतंकवादी दिमाग में छाने लगते है।
       मेरी   बेटी की नौकरी जब मणिपुर में लगी तो उस इलाके में जाने का मौका मिला। सरकारी नौकरी लगने की हमे कोई खास ख़ुशी नहीं हो रही थी बल्कि दिल में डर  बैठ  गया था। इम्फाल  इलाके में  कोई जान -पहचान वाला नहीं  था। उस राज्य के बारे में किसी इंसान से   जानकारी मिलना मुश्किल था। इसलिए इंटरनेट के जरिये  जानकारी हासिल की।
         दिल्ली से   सीधी उडान इम्फाल तक नहीं है। हमारी फ्लाइट सुबह सात बजे की थी। लेकिन एयरपोर्ट पहुंचने पर उसके तीन घंटे देर से उड़ान भरने की खबर लगी। हमे दुःख हुआ  इसके लिए हम सुबह 3 बजे से जग कर काम कर रहे थे। लेकिन कुछ देर हम कुर्सियों पर  बैठे रहे हमसे कुछ दूर आगे कुर्सी जैसी आरामकुर्सी दिखाई दे रही थी। इस समय वे सब भरी हुई थी। कुछ समय बाद जब वो कुर्सी खाली हो गई तो मै  उस पर जा कर सो गई  . कब समय बीत गया पता नहीं चला।
        हम लगभग उड़ान भरने से एक घंटे पहले उठ कर चाय पीने का इंतजाम देखने लगे। तब हमें दिल्ली एयरपोर्ट पर एक जगह चाय की दुकान दिखाई दी। हमने नींद भगाने के ख्याल से तीन कप चाय के  आदेश के साथ पांच सौ का नोट दिया। हमें लगा दुकानवाला कुछ पैसे वापस करेगा लेकिन हमारी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया जब उसने तीन चाय के लिए और पैसे मांगे। हमारे पैसे पूछने पर उसने बताया एक कप चाय दो सौ  रूपये की है।
         ऐसे ही पांच सौ  मिली लीटर पानी की बोतल सौ  रूपये की है।इतने पैसे सुनकर हम दंग  रह गए क्योंकि  हमने इससे पहले केवल दस रूपये की एक कप चाय और 25  रूपये की आधे लीटर पानी की बोतल खरीदी थी।
        कोहरे के कारण उड़ान  देरी की वजह हमे समझ नहीं आ रही थी क्योंकि दिल्ली में मौसम बहुत सुहावना था। कुछ समय बाद हमारा प्लेन आकाश में उड़ने लगा। जहाज गोहाटी होकर जा रहा था। गोहाटी में कुछ सवारिया उतर  कर चली गयी। गोहाटी एयरपोर्ट पर फोटो खींचना मना है। वहाँ  पर सुरक्षा वाले अंदर आने के बाद हर समान की चेकिंग करने लगे हमें बहुत अजीब लग रहा था। लेकिन सुरक्षात्मक पहलू  से उचित था क्योंकि कोई उतरते हुए गलत चीज छोड़ जाये तो यात्रियों की जान को जोखिम का सामना करना पड़ेगा।
        इम्फाल एयरपोर्ट छोटा लेकिन सुंदर है। वहाँ  से इम्फाल देखना बहुत अच्छा लग रहा था। हर तरफ   हरियाली थी। कांगला फोर्ट के चारो तरफ हरियाली बिखरी हुए थी। उसके चारो तरफ पानी की नहर बनी  हुई थी। इसमें हमे कई मंदिर और संग्रहालय दिखाई दिए। उनका वास्तुशिल्प अद्वितीय था। वहाँ का प्रतीक चिन्ह इससे पहले कही नहीं देखा था लेकिन कांगला  फोर्ट में राजमहल जैसी कोई जगह नहीं दिखाई दी इससे पहले हमने जितने किले देखे थे उनमे राजा से सम्बन्धित जगहे दिखाई देती थी लेकिन केवल संग्रहालय में ही राजशाही से सम्बन्धित चीजे थी किसी और जगह नहीं दिखाई दी।
            दिल्ली   जैसे बड़े शहर में  रहने वालो के हिसाब से इम्फाल बहुत छोटी जगह है। मणिपुर की राजधानी होने के कारण हमारा मन विधानसभा, मुख्यमंत्री का घर और   मंत्रियो का घर देखने के लिए लालायित होने लगा। जब हमने इन सभी को देखना शुरू किया तो ये सब हमारे होटल के आस -पास  निकले। लेकिन नया  समझ कर ऑटोरिक्शा वाले ने  हमसे जमकर पैसे वसूल किये। वरना  हम इन जगहों पर पैदल ही जा सकते थे। मणिपुर में दस रूपये सवारी के हिसाब से ऑटो मिलते है। ये लगभग दस रूपये में इम्फाल में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देते है..लोकल लोगो से कम  और ज्यादा दूरी  के लिए समान रूप से दस रूपये लिए जाते है लेकिन बाहरी लोगो से जम कर कमाया जाता है।
           मणिपुरी लोगो का रंगरूप बाहरी  लोगो से अलग होने के कारण दूसरे भारतीयों से अलग पहचान हो जाती है। उनके हिंदी उच्चारण का तरीका भी हमसे अलग होता है जिसके कारण हमे दूर से पहचान लिया जाता है। वहाँ  जाकर हमे विदेशी जैसा एहसास हो रहा था। हम जो कहते उन्हें समझ नहीं  आता था उनकी बोली गयी हिंदी समझने में हमे बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी।
        वहाँ के अधिकतर सभ्य  लोगो को तीन भाषा आती है। वहाँ की भाषा में ल और फ  शब्द की बहुतायत है। शुरू में वहाँ  के नाम पढ़ने  में मुश्किल होती थी क्योंकि जो लिखा होता है उसमे से बहुत सारे  शब्दों के उच्चारण के बिना बोले जाते है धीरे -धीरे उन्हें बोलना आ सका।
       यहाँ का खान -पान बाकि भारत से अलग है। इन जगहों पर दूध बाकि भारत से पांच गुना ज्यादा महंगा है। वहाँ के लोगो को दूध या दूध से बनी चीजे खाने की आदत नहीं होती बल्कि चाय बिना दूध की पी  जाती है। जबकि यहाँ मांसाहारी भोजन सस्ता है। उन्हें समझ नहीं आता शाकाहारी लोग कैसे जीवित रहते है। उन्हें बिना सब्जी के खाना सही लगता है। उनके खाने में हर समय मांसाहार  होता है।
      यहाँ की सब्जी बाजार में चार सब्जी की दुकान के बाद मांस की दुकान मिलना सहज है। सुखी मछली भी खूब मिलती है यहाँ पर राजमा की फली सब्जी के रूप में मिलती है।
     मणिपुर में गंदे नाले नहीं मिलते बल्कि अनेक जगहों पर साफ पानी भरा हुआ दिखाई देता है। जिसमे मछलिया तैरती देखी  जा सकती है। वहां हरियाली और पानी की बहुतायत होने के बाबजूद हानिकारक मच्छर कम दिखाई देते है। उन्होंने  चिकनगुनिया और डेंगू जैसी बीमारी के नाम नहीं सुने है।
         बरसात अधिक होने के कारण अधिकतर सड़के टूटी हुइ  हैं। वहाँ म्युटिनी मेमोरियल देखने लायक जगह हे। दूसरे विश्वयुद्ध के समय  के शहीदों के स्मारक बने है। उस जगह और उनके   बारे में पढ़कर बहुत दुःख होता है वहाँ बीस  से लेकर तीस  बरस के अनेको शहीद  अंतिम निंद्रा में सोये हुए है। उनकी माओ की तकलीफ सोचने पर मजबूर करती है इन्हे कितने लाढ -प्यार से उन्होंने  मरने के लिए पाला  होगा। उनकी मौत का गम उन्हें जिन्दा आग में तड़पाता  होगा। मरने तक उन्हें इस गम से निजाद नहीं मिली होगी। 75  साल बाद उनका दुःख मुझे विह्वल कर गया।
        वहाँ  की आबादी केवल 42000 होने के बाबजूद गहमागहमी दिखाई देती है क्योंकि अधिकतर बाजारों में  औरतो का अधिपत्य है। हर तरफ औरते  दिखाई देती है। आदमी इतने रौबदार  नहीं होते जितनी औरते  आत्मविश्वास से भरी दिखाई देती है। ईमा  बाजार में सारी  औरते  दुकानों पर बैठी दिखाई देती है।
       हर किलोमीटर पर सेना के जवान बंदूकों के साथ खड़े दिखाई देते है। बड़े पुलिस अधिकारी बख्तरबंद गाड़ियों में जाते दिखाई देते है। उनकी गाड़ी से आगे और पीछे गाड़ियां  चलती है। ये सब हमारे लिए अजूबा था।
         इन सब के बाबजूद वहाँ जाकर जिंदगी बिताना दुष्कर है। एक अलग तरह के अनुभव पाने के लिए वहाँ  जाना चाहिए।



   
       

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...