#afghan thinking and sobbing man

          अफगानिस्तान की सोच और सिसकता इंसान 

   


   अफगानिस्तान जैसे देशो में औरतो के ऊपर इतनी अधिक पाबंदियां रही है कि  उनसे अच्छी  जिंदगी जीने के सारे  अधिकार छीन लिए गए है। जरा सी गलती होने पर सरे -आम कोडो  से पीटा  जाता है। किसी गलती के लिए सड़को पर पत्थर मारते हुए मरने पर विवश करना, उन्हें घर से बाहर निकलते समय किसी मर्द को साथ लेकर चलने की मजबूरी। जबकि पिछले  पचास साल के युद्ध काल ने लाखो मर्दो  को मार  डाला है। बहुत सारे  घर मर्द विहीन हो गए है। ऐसे घरो में साथ चलने के लिए औरते मर्द कहाँ  से लाये। 

      वहां पर बहुत सारी  औरते भीख मांगती दिखाई दे जाएँगी। क्योंकि जब बाहर निकलकर  काम काम करने का अधिकार नहीं है, पढ़ने  का अधिकार नहीं है। ऐसे समय में बच्चो का पेट भरना भी बहुत मुश्किल होता है।वहां शरिया कानून लागु करने वाले नहीं सोच पा  रहे, उनके मरने के बाद उनके  परिवार का क्या होगा  ?

         इस हिसाब से कहा  जाता है भारतीय  सेना में नौकरी करने वाले बड़े दिल के होते है। क्योंकि वे अपने परिवार के हर सदस्य को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करते है। क्योंकि वे अपने परिवार को खुद के  मरने के बाद भी जिन्दा और खुश देखना चाहते है।

        वहां भी अधिकतर जीने की उम्मीद कम है। पता नहीं बच्चे और पति जैसे लोग बाहर निकलते समय कब जिंदगी   गवां बैठे ,कुछ पता नहीं है। जो सबसे ऊँचे पायदानों पर बैठे है उनके साथ भी निश्चित नहीं है कि  कब तक जिन्दा रहेंगे। फिर भी अपनी आधी आबादी को दोयम दर्जे का समझ कर उसे बाहर निकलने की आजादी नहीं दे पाते  .वे आज भी पांच सौ  साल पहले का माहौल वापिस लाना चाहते है। उन्हें आजादी देकर आत्मनिर्भर बनाने में संकोच हो रहा है। वहाँ  हजारो साल पहले का शरिया कानून लागु करना ही मात्र मकसद रह गया है। 

          मुझे आज भी तालिवानों की सोच से डर  लगता है। जो आधी दुनियां पर अधिकार करके उनपर शरिया कानून थोपना चाहते है। भारत जैसे देश में भी मुश्लिम इलाको में अभी भी औरतो पर बहुत पाबंदी है।

        कुछ समय पहले कश्मीर जैसे राज्य में  एक लड़की को  जींस पहनने पर गोली मार  दी गयी थी। यदि उनका राज हो गया तो हम भी सिसक -सिसक कर  जियेंगे हमारे आंसू पोंछने वाला भी कोई नहीं होगा।  

#HABIT OF STUDENTS AND SCHOOL

           विद्यार्थियों की आदते और विद्यालय 

     


   आज से सरकार  ने विद्यालय खोल दिए है। सरकार ने बच्चो को सुरक्षित रखने के उपाय सुझाये है। उनका पालन बच्चे केवल अध्यापिका  की उपस्थिति में करते है। बाकि समय एकजुट बैठना पसंद करते है। उनका नकाब भी डांटने पर लगता है या आधा -अधूरा लगा कर सोचते है दूसरो  पर अहसान कर रहे है। बहुत जल्दी नकाब नीचे हो जाता है। उनके पास नकाब नीचे  रखने के अनेक बहाने तैयार रहते है।  उनके लिए जिंदगी से खिलवाड़ करना आसान है। 

       कोई छीकता है या खांसता है तब भी वह और अन्य बच्चे सावधानी नहीं बरतते। उसके भी अनेक बहाने  तैयार होते है। वैसे बच्चे बहुत समय से घर में रहकर परेशान हो गए है। वे आजादी की तलाश में विद्यालय जाना जरूर चाहते है। उन्हें चारदीवारी में बंद रह्ना  बिलकुल पसंद नहीं है। 

       एक दूसरे की चीजों को छूने से परहेज नहीं करते। वे जिस तरह परिवार में रहते है कक्षा में भी वैसे ही रहते है। बड़ी कक्षाओं में हर कालांश  के बाद  अध्यापिका बदलती है। उस समय बच्चे पूरा आजादी का फायदा उठा लेना चाहते है। 

      ये खाना मिल बाँट कर अब भी खाना चाहते है। उन्हें बहुत समझाने  पर भी ये बात समझ में नहीं आती। करोना  दबे पांव किसी पर भी हमला कर सकता है। इस बीमारी के लक्षण कई दिन बाद दिखाई देते है।  तब तक दूसरे के अंदर विषाणु  पहुंच चुके होते है। 

     सरकारी सुविधाओं का जिस तरह से बंदरबांट होता है। उससे सभी तक सुरक्षा के उपाय पहुंचने में मुझे संदेह है।  बच्चो को सुरक्षित रखना उनके अभिभावकों का काम है। यदि उन्हें सुरक्षित और जीवित देखना चाहते है तो उन्हें अभी विद्यालय न भेजना ठीक है। बाकि आपकी मर्जी। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...