चरमराती हुई स्वास्थ्य व्यवस्था
आज वित्त मंत्री जी की स्वास्थ्य सेवा के लिए पैकेज सुनकर मुझे भारत में फैले हुए भ्रस्टाचार की याद आ गई। मै इससे पहले छोटे राज्यों के स्वास्थ्य विभाग के बारे में बता चुकी हूँ। जबकि उससे मेरा वास्ता कम पड़ा है। लेकिन दिल्ली में रहते हुए स्वास्थ्य विभाग के हाल भी अच्छे नहीं है।
मै पिछले दिनों दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी में दवाई के लिए गई। उनसे अपनी बीमारी के लिए दवाई मांगी। उन्होंने खिड़की में से ही पूछा किसी डॉ का परचा लाई हो। मैने कहा- नहीं।
उन्होंने कहा - ऐसे हम दवाई नहीं देते।
मैने कहा - आप देख लीजिये। फिर दवाई दे देना।
लेकिन वे देखने और दवाई देने के लिए तैयार नहीं हुई।
अधिकतर सरकारी दवाखानो में बिना जान -पहचान के अपना इलाज करवाना बहुत कठिन होता है। वहां की भीड़ और पिछली खिड़की से इलाज के कारण सीधे -सादे लोग बिना इलाज के रह जाते है।
यहाँ तक की BP देखने के नाम पर मशीन न होने का बहाना बना देते है। बाद में पता चलता है. सभी डॉ के पास BP की मशीन होती है।
अधिकतर उनसे दवाई मांगने के नाम पर बाहर से लेने के लिए कह देते है. ऐसे में हम जैसे लोग निजी अस्पतालों में जाते है या बाहर से दवाई खरीदते है। हमे न चाहते हुए अपने वेतन का बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च करना पड़ता है।
गरीब लोगो को ऐसे अस्पतालों में कैसा इलाज होता होगा। आप खुद सोच कर देखिये। करोना काल में अस्पतालों की खस्ता हालात की पोल खोल दी है।
सरकार को भेजे गए पैसे का सही हिसाब रखने का तरीका खोजना चाहिए। जिससे सही से इलाज और दवाई जरुरतमंदो को मिल सके। वरना ऊपर से नीचे तक फैले भ्रस्टाचार के कारण मौतों की संख्या अनगिनत हो जाएगी।