भारतीय परिवेश की रूढ़िवादिता और करोना
भारत में आदमियों को घर के काम करना सीखाया नहीं जाता है। इसे केवल औरतो के करने का काम समझा जाता है। यदि औरत बीमार भी हो जाये तब भी उसे काम करना पड़ता है। आदमी अपने लिए घर के काम करना पसंद नहीं करते। उन्हें करोना काल में संक्रमित होकर मरना ठीक लगता है वनिस्वत घर के काम करना।
इसी से सम्बन्धित आपको दो घरो की दास्ताँ बताने जा रही हूँ। एक घर में जब औरत संक्रमित हो गई। उसकी जवान बेटी से पूछा। उसका जबाब सुनकर हैरानी हुई - "खाना तो माँ ही बनाएगी। हम कैसे बना सकते है। " उस संयुक्त परिवार में दस सदस्य है। कभी कोई उम्र में बड़ा है तो कोई मर्द है इस कारण घर की जिम्मेदारी निभाना घर की औरत का काम है।
उस परिवार की जेठानी घर से बाहर कुछ दिनों के लिए गई हुई थी। उसे जल्दी से घर के काम करने के लिए बुलाया गया। उसकी टिकट बुक कराने और आने में कुछ दिन की देरी हो गई। लेकिन इतने समय में कई परिवारिक सदस्य संक्रमित हो चुके थे। लेकिन अपने बचाव के लिए काम करके अपनी मर्दानगी पर चोट पहुँचाना पसंद नहीं था।
दूसरे [परिवार में बच्चे को जन्म देने वाली मां से काम करवाना गवारा था। लेकिन अपने कमरे में रखे हुए बर्तनो को साफ करना गवारा नहीं था।उन्हें अलग कमरे में रखकर कोरंटीन किया गया था। उनसे अपने कमरे में रखे हुए झूठे बर्तन साफ करने या उन्हें निकालकर बाहर रखने में शर्म आ रही थी। उन्हें उस बच्चे की मां और अपने शिशु के प्रति कोई हमदर्दी नहीं थी। यदि उनकी पत्नी और बच्चे को कुछ हो गया तब उनकी मर्दानगी को तसल्ली देने कौन आएगा। इस बारे में सोचने का वक्त उनके पास नहीं है। जबकि बच्चे का जन्म ऑपरेशन से हुआ है। बच्चे के जन्म से माँ बहुत बीमार चल रही है। वह बीमारी की हालत में सारे काम कर रही है। लेकिन जिन्हे उसका पालनहार समझा जाता है। उन्होंने उसकी तबियत के बारे में जानने की भी कभी कोशिश नहीं की।
जिससे भी बात करो। सभी यही कह रहे है। घर के काम करना तो औरत की जिम्मेदारी है। आदमी कैसे काम कर सकते है.अब आप ही बताइये इतनी मौतो का जिम्मेदार केवल करोना है या हमारी मानसिकता है।