#HOUND AMID TERROR OF CORONA

                कोरोना  के  आतंक के बीच  होली 

    आपने कोरोना के बारे में जानकारी कई तरह से हासिल की है। सरकार  भी हर उपाय करके लोगो को इसके प्रति जागरूक कर रही है। इस जानकारी का असर मुझ पर भी पड़ा है। शायद आप भी मेरी तरह महसूस कर  हो। मे  अपने विचार आपसे साझा कर रही हूँ शायद   आपको भी ऐसा ही एहसास हो रहा हो। 
          अबकी बार मेरे आसपास होली का हुड़दंग दिखाई नहीं दिया। क्योंकि पहले ही देश के बड़े नेताओ ने होली समारोह में शामिल होने से मना  कर दिया था। हमें ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन इतना पता था होली समारोह आयोजन पर पाबंदी लगाई गई है तो जरूर बड़ी बात होगी।
         वुहान  शहर की खबरे भी आतंकित कर रही थी। इसलिए दिल्ली के घर छोटे होने के कारण होली अधिकतर छतो ,सड़को ,पार्क या मैदानों में मनाई जाती थी , लेकिन मुझे कुछ छत्तो पर  परिवारों के बीच  मस्ती का माहौल दिखा। जहां अधिकतर छते गीत ,संगीत नृत्य ,रंग,गुलाल और पानी  से सराबोर  होती थी वही इसबार कुछ ही जगह ऐसा माहौल दिखाई दिया। उनकी बहादुरी देखकर उनके जज्बे के लिए दाद देने का मन कर रहा था। 
       मेने भी इस बार पारिवारिक सदस्यों से मात्र गुलाल लगवाया। किसी के द्वारा पानी डालने से मना  कर दिया। क्योकि यदि जुकाम भी ठण्ड लगने से हो गया तो कोई मुझे कोरोना का मरीज न समझ बैठे।
      होली पर मेरा घर बहुत गन्दा हो जाता था लेकिन कोरोना के डर  के कारण अंदर बाहर किसी तरह की गंदगी नहीं फैली। घर को भी रगड़ कर साफ नहीं करना पड़ा। 
       आजकल ऑटो या रिक्शा में बैठते हुए यदि किसी के मुँह पर मास्क लगा दिख जाता है तो वह कोरोना का मरीज लगने लगता है। उसे देखकर हम अपना भी मुँह किसी चीज से ढकने लगते है। मानो वायरस इस तरफ न आ जाये। 
      कुछ समय पहले तक हम जुकाम खांसी से इस कदर नहीं डरते थे। घर में इस मौसम में इसका होना स्वाभाविक लगता था। अब मेरे सामने यदि जुकाम का मरीज दिखाई देता है तो साक्षात यमराज का अवतार दिखाई देने लगता है। मेरे सामने एक सहयोगी को जुकाम हो गया। उसे होली का सामान देते हुए भी डर लग रहा था कही इसके द्वारा वायरस इधर न आ जाये उसने खुद ही सामान छूने से मना  कर दिया।बाकि सदस्यों ने भी सेनिटिज़र से हाथ साफ करके सामान पकड़ा। अब सभी के बैग में सेनिटीज़र  दिखाई देने लगा हे।  
        इससे पहले मेरी एक सहयोगी अपने परिवार में जुकाम के मरीज को अलग कमरे में रखती थी। उसमे किसी को जाने से मना  करती थी। अपने बच्चो को भी कहती थी पापा को कोई सामान देना हो तो बहुत दूर से देना। मुझे उसका बर्ताव बहुत अजीव लगता था। मेरे हिसाब से मरीज के करीब रहने से रोगी में सुधार  जल्दी होता है। लेकिन उसकी ये आदत अब सही लग रही है।
      सरकार  की हर तरह से जानकारी का असर इतना ज्यादा होने लगा है। कि  मेने मेट्रो में मास्क लगाया। लेकिन इसकी आदत न होने के कारण या नया होने से जब उतारा।  तब मास्क के निसान  मेरे पूरे  चेहरे पर बन गये  थे।
       बचपन से सुना था मुँह ढककर मत सोयो। ताजी  हवा शरीर में जानी  चाहिए इस कारण नाक  ढकते ही दम घुटने लगता है। लेकिन अब हमे नयी पीढ़ी को कहना पड़ेगा अपने घर में कुछ रखो या न रखो लेकिन मास्क रखो। यह बहुत जरूरी है जैसे माँ बच्चे को घर का खाना और पानी देती है आने  वाले समय में बस्ते  में मास्क रखना भी नहीं भूलेगी। क्योंकि आये दिन मास्क की जरूरत पड़ने लगी है। 
       मुझे स्वचालित सीढ़ियों पर चढ़ते समय रेलिंग पकड़ने की आदत है। लेकिन इस बार एस्केलेटर पर चढ़ते समय मेने बिलकुल कही हाथ रखने की कोशिश नहीं की। इस कारण पूरे  समय डर  लगता रहा। जो लोग हाथो से सहारा ले रहे थे उनकी नासमझी पर हैरानी हो रही थी। 
       मैने  किसी बटन या स्विच को दबाने से भी बचने की कोशिश की। 
सरकारी विद्यालयों में सरकार ने नाम के लिए छुट्टी घोषित की है। एक दिन पेपर के समय एक बच्चे को छींक आ गयी। सारे छात्र उसे मास्क पहनने के लिए कहने लगे। जबकि उसने कहा मुझे कुछ नहीं हुआ लेकिन कक्षा के सभी छात्र कोरोना -कोरोना कहकर मजाक बनाने लगे। लेकिन कुछ बच्चो ने जिनके पास मास्क था पहन लिया लेकिन उन्होंने उसे सही तरीके  से नहीं पहना था। उनकी लापरवाही का परिणाम क्या होगा पता नहीं। उनका खिलंदड़ापन उन्हें किस जगह पहुचायेगा यह वक्त ही बताएगा। 
   इतनी सावधानी बरतने पर भी यदि कोरोना हो जाये तो इसे किस्मत ही कहेंगे। 

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