#INDIAN ISOLATION AND CORENTIANE

            भारतीय आइसोलेशन और कोरेनटाइन  

     Boost your immune system to fight the spread of coronavirus   2019 Novel Coronavirus (COVID-19) - HealthyChildren.org हPrince Charles Offers Namastes Rather Than Handshakes at ...
           हमारे घर  में ज्यादा  छूत  -छात  या अलगाव का माहौल नहीं था। लेकिन कई घरो में हर चीज छूने से पहले हाथ धुलवाये  जाते थे। हमें ऐसे घरो में जाना अच्छा नहीं लगता था। .क्योंकि बहुत सालो से इस तरह  की  बीमारी(कोरोना ) दिखाई नहीं दी।  हमे इस तरह का  व्यवहार   ढकोसला लगने लगा था। मैंने औरो के मुँह से भी सुना था कि  वह आंटी  बहुत सफाई पसंद है जब देखो तब हाथ धोने के लिए कहती रहती है। 
       पुराने समय में भारत में अंग्रेजो का राज था। स्वास्थ्य सेवाओं का आभाव था। गरीब लोगो तक इलाज की पहुंच नहीं थी। महामारियों के कारण बहुत मौते होती थी।  उस समय बीमार को एक अलग कमरे में रख कर उन्हें तथा  परिवार को बीमारियों से बचाने  की कोशिश की जाती थी। मुझ  से पहले की पीढ़ी में भी प्रत्येक घर में चार -पांच बच्चे होना आम बात थी जिनके घर में एक या दो बच्चे होते थे उन्हें अचम्भे से देखा जाता था। मेरी जानकारी  में  ऐसे बहुत सारे  परिवार थे। जिनके यहाँ ग्यारह बच्चे हुए उसके बाबजूद एक ही बच्चा जीवित बचा। 
     मैंने ऐसे परिवार भी देखे थे जिन घरो में एक औरत ने 22  बच्चो को जन्म दिया। वह बच्चा भी बाईसवाँ  जन्म दिन नहीं मना सका।  22  बच्चो में से उस दम्पत्ति के बुढ़ापे तक केवल एक बच्चा ही जीवित बचा। उस एक बच्चे से उसका वंश चला। 
       आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा होगा लेकिन ये मेरे परिवार के सदस्य थे। आपने  कई बार सुना होगा भारत  के कुछ राज्यों (राजस्थान , उत्तरप्रदेश ,बिहार )में डॉक्टर की लापरवाही से एक दिन में सौ बच्चो की मौत हो गई। हमारे लिए ये सिर्फ आंकड़ा है। लेकिन उस औरत की कल्पना कीजिये जिसने बच्चे को  जन्म देने और उसे पालने  में कितना कष्ट सहा होगा उस परिवार ने कुदरत और स्वास्थ्य कर्मचारियों की लापरवाही के कारण अपने जीते -जागते बच्चे को खो दिया।भारत में आज भी बाल मृत्यु दर और गर्भवती महिलाओ की मृत्यु दर अविकसित  देशो से भी ज्यादा है। 
       लोग अपने मन को दूसरे को दोष देकर सांत्वना पा जाते है। समाज में जितनी विरूपताये पायी जाती है उनका आक्षेप सीधे औरत पर लगा दिया जाता है। किसी औरत का बच्चा मर जाये तो किसी कमजोर  औरत को ढूंढा जाता है। किसी  परिवार में  मौत होने का कारण भी औरत पर लगाने से लोग  बाज  नहीं आते।उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जगहों पर किसी औरत को इसका कारण बता कर उसे डायन करार दे दिया जाता है।  किसी पारिवारिक सदस्य की मौत से वेहाल वह  औरत कैसे अपने मन को समझाती होगी।
        मै  आज के समय की  शहर में रहने वाली `एम् ए बीएड  सरकारी कर्मचारी  हूँ। उसके बाबजूद ये सब मेने देखा है। जबकि  कल्पना करके देखिये गांव और छोटे शहरो में कैसा  होता होगा।
        औरते सारी जिंदगी पूजा -पाठ व्रत उपवास करती रहती है। अधिकतर मर्द उनका मजाक बनाते है। लेकिन उनकी सामर्थ्य केवल भगवान को मनाने तक सीमित  है।उनको सान्त्वना  देने का काम भगवान  ही कर सकता है   इसलिए वे धर्म की शरण में चली जाती है। वही उन्हें शांति मिलती है।  मै  ज्यादा धार्मिक नहीं हूँ लेकिन कोरोना महामारी ने मुझे भी धार्मिक बना दिया है। मैं  अपने आसपास किसी को खोना नहीं चाहती। 
      हिन्दू संस्कृति में सूतक लगना ,मृत्यु पर अलग रहना , जन्म ,अंतिम संस्कार से आने के बाद बाहर सबसे पहले  नहा  कर घर में आना ,हवन करना ,आरती ,कपूर जलाना , घंटी ,शंख बजाना ,घर में पैर धोकर आना ,खास दिनों में नदियों में स्नान करना ,बीमार को नीम ,खाने में हल्दी ,नमस्ते करना ,खास दिवसों पर पूजा -पाठ के द्वारा शुद्धि करना ,त्योहारों पर विशेष सफाई ,रोज धुले कपड़े पहनना और शाकाहारी भोजन ,इससे हमारी संस्कृति के महत्व और उनकी बारीकियों को ढंग से समझने की आवश्यकता है। 
       आज हमें गर्व होना चाहिए कि पूरा विश्व हमारी संस्कृति को सम्मान से देख रहा है वो अभिवादन के लिए हाथ जोड़ रहा है वो शव जला रहा है जिससे जलने के साथ विषाणु  भी जल जाये ,वो हमारा अनुसरण कर रहा है। हमारी संस्कृति प्राचीन के साथ वैज्ञानिक है। ये संस्कृति पर गर्व करके पालन करने का समय है। इसके कारण हम बहुत सारी मुसीबतो से बच जायेंगे। 
      

#HOUND AMID TERROR OF CORONA

                कोरोना  के  आतंक के बीच  होली 

    आपने कोरोना के बारे में जानकारी कई तरह से हासिल की है। सरकार  भी हर उपाय करके लोगो को इसके प्रति जागरूक कर रही है। इस जानकारी का असर मुझ पर भी पड़ा है। शायद आप भी मेरी तरह महसूस कर  हो। मे  अपने विचार आपसे साझा कर रही हूँ शायद   आपको भी ऐसा ही एहसास हो रहा हो। 
          अबकी बार मेरे आसपास होली का हुड़दंग दिखाई नहीं दिया। क्योंकि पहले ही देश के बड़े नेताओ ने होली समारोह में शामिल होने से मना  कर दिया था। हमें ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन इतना पता था होली समारोह आयोजन पर पाबंदी लगाई गई है तो जरूर बड़ी बात होगी।
         वुहान  शहर की खबरे भी आतंकित कर रही थी। इसलिए दिल्ली के घर छोटे होने के कारण होली अधिकतर छतो ,सड़को ,पार्क या मैदानों में मनाई जाती थी , लेकिन मुझे कुछ छत्तो पर  परिवारों के बीच  मस्ती का माहौल दिखा। जहां अधिकतर छते गीत ,संगीत नृत्य ,रंग,गुलाल और पानी  से सराबोर  होती थी वही इसबार कुछ ही जगह ऐसा माहौल दिखाई दिया। उनकी बहादुरी देखकर उनके जज्बे के लिए दाद देने का मन कर रहा था। 
       मेने भी इस बार पारिवारिक सदस्यों से मात्र गुलाल लगवाया। किसी के द्वारा पानी डालने से मना  कर दिया। क्योकि यदि जुकाम भी ठण्ड लगने से हो गया तो कोई मुझे कोरोना का मरीज न समझ बैठे।
      होली पर मेरा घर बहुत गन्दा हो जाता था लेकिन कोरोना के डर  के कारण अंदर बाहर किसी तरह की गंदगी नहीं फैली। घर को भी रगड़ कर साफ नहीं करना पड़ा। 
       आजकल ऑटो या रिक्शा में बैठते हुए यदि किसी के मुँह पर मास्क लगा दिख जाता है तो वह कोरोना का मरीज लगने लगता है। उसे देखकर हम अपना भी मुँह किसी चीज से ढकने लगते है। मानो वायरस इस तरफ न आ जाये। 
      कुछ समय पहले तक हम जुकाम खांसी से इस कदर नहीं डरते थे। घर में इस मौसम में इसका होना स्वाभाविक लगता था। अब मेरे सामने यदि जुकाम का मरीज दिखाई देता है तो साक्षात यमराज का अवतार दिखाई देने लगता है। मेरे सामने एक सहयोगी को जुकाम हो गया। उसे होली का सामान देते हुए भी डर लग रहा था कही इसके द्वारा वायरस इधर न आ जाये उसने खुद ही सामान छूने से मना  कर दिया।बाकि सदस्यों ने भी सेनिटिज़र से हाथ साफ करके सामान पकड़ा। अब सभी के बैग में सेनिटीज़र  दिखाई देने लगा हे।  
        इससे पहले मेरी एक सहयोगी अपने परिवार में जुकाम के मरीज को अलग कमरे में रखती थी। उसमे किसी को जाने से मना  करती थी। अपने बच्चो को भी कहती थी पापा को कोई सामान देना हो तो बहुत दूर से देना। मुझे उसका बर्ताव बहुत अजीव लगता था। मेरे हिसाब से मरीज के करीब रहने से रोगी में सुधार  जल्दी होता है। लेकिन उसकी ये आदत अब सही लग रही है।
      सरकार  की हर तरह से जानकारी का असर इतना ज्यादा होने लगा है। कि  मेने मेट्रो में मास्क लगाया। लेकिन इसकी आदत न होने के कारण या नया होने से जब उतारा।  तब मास्क के निसान  मेरे पूरे  चेहरे पर बन गये  थे।
       बचपन से सुना था मुँह ढककर मत सोयो। ताजी  हवा शरीर में जानी  चाहिए इस कारण नाक  ढकते ही दम घुटने लगता है। लेकिन अब हमे नयी पीढ़ी को कहना पड़ेगा अपने घर में कुछ रखो या न रखो लेकिन मास्क रखो। यह बहुत जरूरी है जैसे माँ बच्चे को घर का खाना और पानी देती है आने  वाले समय में बस्ते  में मास्क रखना भी नहीं भूलेगी। क्योंकि आये दिन मास्क की जरूरत पड़ने लगी है। 
       मुझे स्वचालित सीढ़ियों पर चढ़ते समय रेलिंग पकड़ने की आदत है। लेकिन इस बार एस्केलेटर पर चढ़ते समय मेने बिलकुल कही हाथ रखने की कोशिश नहीं की। इस कारण पूरे  समय डर  लगता रहा। जो लोग हाथो से सहारा ले रहे थे उनकी नासमझी पर हैरानी हो रही थी। 
       मैने  किसी बटन या स्विच को दबाने से भी बचने की कोशिश की। 
सरकारी विद्यालयों में सरकार ने नाम के लिए छुट्टी घोषित की है। एक दिन पेपर के समय एक बच्चे को छींक आ गयी। सारे छात्र उसे मास्क पहनने के लिए कहने लगे। जबकि उसने कहा मुझे कुछ नहीं हुआ लेकिन कक्षा के सभी छात्र कोरोना -कोरोना कहकर मजाक बनाने लगे। लेकिन कुछ बच्चो ने जिनके पास मास्क था पहन लिया लेकिन उन्होंने उसे सही तरीके  से नहीं पहना था। उनकी लापरवाही का परिणाम क्या होगा पता नहीं। उनका खिलंदड़ापन उन्हें किस जगह पहुचायेगा यह वक्त ही बताएगा। 
   इतनी सावधानी बरतने पर भी यदि कोरोना हो जाये तो इसे किस्मत ही कहेंगे। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...