भारतीय आइसोलेशन और कोरेनटाइन
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हमारे घर में ज्यादा छूत -छात या अलगाव का माहौल नहीं था। लेकिन कई घरो में हर चीज छूने से पहले हाथ धुलवाये जाते थे। हमें ऐसे घरो में जाना अच्छा नहीं लगता था। .क्योंकि बहुत सालो से इस तरह की बीमारी(कोरोना ) दिखाई नहीं दी। हमे इस तरह का व्यवहार ढकोसला लगने लगा था। मैंने औरो के मुँह से भी सुना था कि वह आंटी बहुत सफाई पसंद है जब देखो तब हाथ धोने के लिए कहती रहती है।
पुराने समय में भारत में अंग्रेजो का राज था। स्वास्थ्य सेवाओं का आभाव था। गरीब लोगो तक इलाज की पहुंच नहीं थी। महामारियों के कारण बहुत मौते होती थी। उस समय बीमार को एक अलग कमरे में रख कर उन्हें तथा परिवार को बीमारियों से बचाने की कोशिश की जाती थी। मुझ से पहले की पीढ़ी में भी प्रत्येक घर में चार -पांच बच्चे होना आम बात थी जिनके घर में एक या दो बच्चे होते थे उन्हें अचम्भे से देखा जाता था। मेरी जानकारी में ऐसे बहुत सारे परिवार थे। जिनके यहाँ ग्यारह बच्चे हुए उसके बाबजूद एक ही बच्चा जीवित बचा।
मैंने ऐसे परिवार भी देखे थे जिन घरो में एक औरत ने 22 बच्चो को जन्म दिया। वह बच्चा भी बाईसवाँ जन्म दिन नहीं मना सका। 22 बच्चो में से उस दम्पत्ति के बुढ़ापे तक केवल एक बच्चा ही जीवित बचा। उस एक बच्चे से उसका वंश चला।
आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा होगा लेकिन ये मेरे परिवार के सदस्य थे। आपने कई बार सुना होगा भारत के कुछ राज्यों (राजस्थान , उत्तरप्रदेश ,बिहार )में डॉक्टर की लापरवाही से एक दिन में सौ बच्चो की मौत हो गई। हमारे लिए ये सिर्फ आंकड़ा है। लेकिन उस औरत की कल्पना कीजिये जिसने बच्चे को जन्म देने और उसे पालने में कितना कष्ट सहा होगा उस परिवार ने कुदरत और स्वास्थ्य कर्मचारियों की लापरवाही के कारण अपने जीते -जागते बच्चे को खो दिया।भारत में आज भी बाल मृत्यु दर और गर्भवती महिलाओ की मृत्यु दर अविकसित देशो से भी ज्यादा है।
लोग अपने मन को दूसरे को दोष देकर सांत्वना पा जाते है। समाज में जितनी विरूपताये पायी जाती है उनका आक्षेप सीधे औरत पर लगा दिया जाता है। किसी औरत का बच्चा मर जाये तो किसी कमजोर औरत को ढूंढा जाता है। किसी परिवार में मौत होने का कारण भी औरत पर लगाने से लोग बाज नहीं आते।उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जगहों पर किसी औरत को इसका कारण बता कर उसे डायन करार दे दिया जाता है। किसी पारिवारिक सदस्य की मौत से वेहाल वह औरत कैसे अपने मन को समझाती होगी।
मै आज के समय की शहर में रहने वाली `एम् ए बीएड सरकारी कर्मचारी हूँ। उसके बाबजूद ये सब मेने देखा है। जबकि कल्पना करके देखिये गांव और छोटे शहरो में कैसा होता होगा।
औरते सारी जिंदगी पूजा -पाठ व्रत उपवास करती रहती है। अधिकतर मर्द उनका मजाक बनाते है। लेकिन उनकी सामर्थ्य केवल भगवान को मनाने तक सीमित है।उनको सान्त्वना देने का काम भगवान ही कर सकता है इसलिए वे धर्म की शरण में चली जाती है। वही उन्हें शांति मिलती है। मै ज्यादा धार्मिक नहीं हूँ लेकिन कोरोना महामारी ने मुझे भी धार्मिक बना दिया है। मैं अपने आसपास किसी को खोना नहीं चाहती।
हिन्दू संस्कृति में सूतक लगना ,मृत्यु पर अलग रहना , जन्म ,अंतिम संस्कार से आने के बाद बाहर सबसे पहले नहा कर घर में आना ,हवन करना ,आरती ,कपूर जलाना , घंटी ,शंख बजाना ,घर में पैर धोकर आना ,खास दिनों में नदियों में स्नान करना ,बीमार को नीम ,खाने में हल्दी ,नमस्ते करना ,खास दिवसों पर पूजा -पाठ के द्वारा शुद्धि करना ,त्योहारों पर विशेष सफाई ,रोज धुले कपड़े पहनना और शाकाहारी भोजन ,इससे हमारी संस्कृति के महत्व और उनकी बारीकियों को ढंग से समझने की आवश्यकता है।
आज हमें गर्व होना चाहिए कि पूरा विश्व हमारी संस्कृति को सम्मान से देख रहा है वो अभिवादन के लिए हाथ जोड़ रहा है वो शव जला रहा है जिससे जलने के साथ विषाणु भी जल जाये ,वो हमारा अनुसरण कर रहा है। हमारी संस्कृति प्राचीन के साथ वैज्ञानिक है। ये संस्कृति पर गर्व करके पालन करने का समय है। इसके कारण हम बहुत सारी मुसीबतो से बच जायेंगे।