दिल्ली का घूमता हुआ रेस्टोरेंट परिक्रमा
यहां पर हर टेबल के सामने जगह का नाम लिखा हुआ है। जैसे प्रगति मैदान, राष्ट्रपति भवन और गुरुद्वारा आदि। पहले मुझे समझ नहीं आया। लेकिन बाद में समझ आया. यदि आप इस समय खिड़की से बाहर देखो तो वही दृश्य दिखाई देता है। हम इतनी ऊंचाई पर बैठे थे कि दूर -दूर तक सारा इलाका दिखाई देता है। वहाँ इससे ऊँची अन्य कोई इमारत नहीं थी।
जहां हमारी मेज लगी हुई थी वह जगह घूम रही थी। बाकि पूरी इमारत स्थिर थी। लगे हुए बोर्ड स्थिर थे मेजो की जगह घूमने के कारण बोर्ड के सामने आने पर बाहर वही जगह दिखाई देती है। मेज वाली जगह इतनी धीरे घूम रही थी कि शुरुरात में पता नहीं चल रहा था गौर से देखने पर महसूस होता है। बाहर के दृश्य बदल रहे है। साथ ही नीचे की जगह अस्थिर है। लेकिन इतनी ऊंचाई से घूमते हुए रेस्टोरेंट में बैठ कर डर नहीं लग रहा था क्योंकि वह बहुत धीरे घूम रहा था। इतने धीरे गौर से महसूस करने पर ही पता चलता था। किसी तरह की मशीनों की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। जैसे झूले पर झूलते हुए पता चलती है। इतनी ऊंचाई से बाहर की आवाजे भी सुनाई नहीं दे रही थी। कई लोगो को झूले पर झूलते हुए डर लगता है लेकिन इसमें किसी तरह का डर महसूस नहीं हो रहा था। बल्कि रोमांचक एहसास था।
इस रेस्टोरेंट में सभी चीजों की कीमत आठ सौ रूपये से शुरू होकर कई हजार तक होती है। एक रोटी की कीमत भी 90 रूपये थी। मुझे ये रेस्टोरेंट बहुत महंगा लगा लेकिन उसके बाबजूद खचाखच भरा हुआ था। मुझे लोगो की अमीरी पर रश्क होने लगा। ये लोग एक समय के खाने पर कितना खर्च करने की हैसियत रखते है।
खाना खाते हुए बाहर के दृश्य ने मॅहगाई के अहसास को छूमंतर कर दिया। क्योंकि हम इतनी ऊंचाई पर बड़ी -बड़ी खिड़कियों के सामने बैठे हुए थे।मुझे लगने लगा हम साधारण लोग नहीं बल्कि किसी दूसरे ग्रह के जीव है या देवी -देवता। जो अपना लोक छोड़ कर भृमण करने निकले है।