#DIFFERENT MEANING OF MARRIAGE

                                    शादी के मायने 

   एक दिन मेरे  पड़ोस में एक परिवार  रहने आया। जिसमे उस परिवार में चार सदस्य थे। उनके दो बच्चे  थे  उसकी  बड़ी लड़की 10  साल की थी और बेटा  चार साल का था। मूर्ति साक्षात् मूर्ति के समान  थी।   मूर्ति बहुत सूंदर और गाने- बजाने में निपुण थी। वह पुरे जोश से कीर्तन करती थी। ढोलक बजाते हुए लगता था जैसे जोश में ढोलक ही फाड् देगी। गाते -बजाते हुए पसीने से सराबोर हो जाती थी। लगातार एक के बाद दूसरा गाना गाती  चली जाती थी। वह गाने -बजाने  में कभी नानुकुर नहीं करती थी।  उसका गाने -बजाने में सानी  नहीं था। हम उसके साथ केवल सहायक की भूमिका निभाते थे। उसे किसी और साथी की जरूरत नहीं थी। वह अकेली एक मण्डली के समान  थी।
      पूरे  दिन घर के काम में लगी रहती थी। उसके आलावा अपने पति के कारखाने में काम भी करती थी। उसके चेहरे पर काम को लेकर परेशानी नहीं दिखाई देती थी। हर समय हँसती- मुस्कराती  जोश से भरी रहती थी। 
           एक दिन मुझे पता चला मूर्ति की यह दूसरी शादी थी। उसकी पहली शादी 18  साल की उम्र में हो गई थी। जिसके कारण उसके  22  साल की उम्र तक दोनों बच्चे हो गए। जब वह 24  साल की हुई। तब तक उसका जीवनसाथी उसे दुनियाँ  में अकेला छोड़ कर स्वर्ग चला गया। 
     शहरो में जिस उम्र में लड़कियाँ  शादी के ख्यालो में खोने लगती है। तब तक मूर्ति की दुनियाँ  उजड़ चुकी थी। मासूम सी मूर्ति की गोद  में दो नन्हे बच्चे कुलमुला रहे थे। मूर्ति उन नन्ही सी जानो  को चुप कराये या अपने उमड़ते आंसुओं को रोके उसे कुछ समझ नहीं आता था।
       मूर्ति ने पढ़ाई  भी केवल नौवीं  तक की थी। उसके परिवार वालो ने उसे ज्यादा पढ़ाना  उचित नहीं  समझा था। उन्होंने बेटी को जिम्मेदारी समझ कर जल्दी से मुक्ति पाने में अपनी भलाई समझी थी। उसके जीवन में पूरी तरह अंधकार छा  गया था। 
        उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसी हालत से पार  कैसे पाया जा सकता है। उसने खुद को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। इतनी छोटी उम्र में दो बच्चो के साथ जिंदगी की दौड़ में किस तरह पार  पहुंचेगी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 
       कुछ समय तक मूर्ति रोती -विलखती  घर और बच्चो के काम में खुद को भुलाये रहती। लेकिन रात  का अँधेरा उसे पति की यादो में ले जाता। 
     ससुराल में रहते हुए उसे दिन -रात  पति की मौत  का उलाहना दिया जाता। जैसे उसके कारण ही उसके पति की मौत हुई  है। यदि उससे उसकी शादी नहीं हुई होती तो वह सौ साल तक जीवित रहता। ऐसे दमघोटू माहौल में उसके लिए साँस लेना  भी मुश्किल होता था। 
          कुछ समय बाद मायके आने पर उसके घरवालो  ने मूर्ति को वापस भेजने से मना  कर दिया। मायके वाले ज्यादा अमीर नहीं थे। लेकिन उसकी दयनीय  हालत देखकर उनका दिल पसीज गया। मूर्ति के मायके वालो के  लिए तीन जनो  का खर्चा वहन करना मुश्किल था। 
   इसलिए   उसके मायके वालो ने उसके लिए  रिश्ता देखना शुरू कर दिया। लेकिन दो बच्चो की विधवा के साथ शादी करने की बात सुनकर लोग वापस नहीं आते। जबकि उसकी उम्र केवल 26  साल ही थी। धीरे -धीरे दिन बीतते जा रहे थे। उसकी उम्र बढ़ती जा रही थी। 
       एक दिन उनके पास पांच बच्चो के विधुर बाप का रिश्ता आया। उसके परिवार वालो को वह रिश्ता पसंद नहीं था। लेकिन मज़बूरी में उन्होंने मूर्ति की शादी उससे करने में भलाई समझी। 
      जिंदगी के इस रूप को मूर्ति ने खुद को ढालना शुरू कर दिया। उसके पति के पांच बच्चे शादी की उम्र के होने लगे तब हँसते -मुस्कुराते हुए उसने उनकी शादी कर दी। उसे देखकर नहीं लगता था। ये उसकी सौतन के बच्चे है। शादी करने के बाद वह बेटे अलग रहने लगते। क्योंकि वह खुद भी किराये के मकान में रहती थी। उसने जिंदगी को लेकर कभी कोई गिला -शिकवा नहीं किया। 
    बाकी  अगली बार -------

COURAGE AND LIFE

                   जुझारूपन से किस्मत  को मात

   जिंदगी के खेल निराले होते है। ऐसी ही एक दास्ताँ मेरे सामने आयी । एक दिन मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। वह 1984  के दंगो में अपने माता -पिता को खो चुकी थी।
        उस समय उसकी उम्र केवल तीन साल की थी। उसे अभी दुनियाँ  की समझ भी नहीं थी। वह हर समय माँ के पल्लू से चिपकी रहती थी। अचानक उसकी दुनिया में झंझावात आ गया। उसे इन हालातो की सही तरह से समझ भी नहीं थी।
       जो हो रहा है। क्यों हो रहा है। वह चीख -चीख कर रो कर ही इन को रोकने का प्रयास कर रही थी। अपने छोटे -छोटे हाथो से उन आताताइयों को रोकने की कोशिश कर रही थी. उन नृशंस लोगो को किसी पर तरस नहीं आया। उसके सामने उसके माँ -बाप और बड़े भाई -बहनो को जिन्दा आग के हवाले कर दिया गया। उस पर किसी की नजर नहीं पड़ी। या उसको किसी ने महत्व नहीं दिया।
         अगले दिन लाशो के ढेर में  मनमीत  मिली। जो घायल थी मगर जिन्दा  सांसे ले रही थी। एक रहमदिल पडोसी का ध्यान उसकी तरफ गया। उसने इस बात को अन्य लोगो पर जाहिर नहीं होने दिया।उसे  चुपचाप अपने घर ले आया। घर में उसकी देखभाल से वह स्वस्थ  हो गयी। इस बीच  दंगे  खत्म हो गए। जिस भले पडोसी ने इतने दिन देखभाल की थी। अब वह मनमीत के रिश्ते दारो को केम्प में ढूंढने लगे।
       एक दिन उन्हें उसके चाचा  मिल गए। वे भी दंगे से प्रभावित थे। लेकिन उन्होंने माल  का नुकसान उठाया था। लेकिन उनके परिवार की जान बच गई थी। उनकी तीन बेटियाँ  और दो बेटे थे। सब सही सलामत थे। उन्हें सही समय पर केम्प में पहुँचा दिया गया था।
      उनके मकान  को जला दिया गया था। और दुकान को लूट लिया गया था। लेकिन जान बच गयी थी उसका उन्होंने तहे  दिल से शुक्रिया अदा  किया।
      उनके  लिए  इतने बड़े परिवार की देखभाल करना बहुत मुश्किल था। उन्हें विभाजन के बाद दूसरा उजड़ने का  दंश  साल रहा था। दादाजी बिलकुल चुप हो गए थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। जवानी में विभाजन का झटका झेल गए थे लेकिन बुढ़ापा बहुत दुखदाई प्रतीत हो रहा था।
       सरदारों की हिम्मत कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने जोशीले अंदाज से मनमीत को अपने गले लगा लिया। साथ ही आंसुओ की धारा बह  निकली उन्हें अपने बड़े बेटे के परिवार के खत्म होने का  दुःख सता रहा था  ।                उन्होंने घर आकर अपने उजड़े आशियाने को संभालना शुरू किया। लुटी हुई दुकान में फिर से सामान डाला। जिंदगी की जद्दोजहद शुरू हो गयी।
       सबसे पहले बच्चो की पढ़ाई  का इंतजाम किया। बच्चे पढ़ने  में मन लगाने लगे। इस तरह समय बीतता गया। समय आने पर सब काम -काज में लग गए तब उन्होंने  सबकी शादी कर दी। । जिंदगी पटरी पर आ गयी थी। अब मनमीत के चाचाजी ने सुख की साँस ली।
        मनमीत बैंक में बड़ी अफसर बन गयी थी। उसकी शादी को तीन साल हो गए थे। अचानक उसे बच्चेदानी के कैंसर का पता चला। इसकी खबर सुनते ही सन्न रह गयी। अभी तक उसने मेहनत की थी। उस मेहनत का फल अब मिलने लगा था। तभी किस्मत ने फिर से झटका दे दिया। कई दिन आंसुओ में डूब  गए। फिर हिम्मत जुटा  कर डॉक्टर  की देखरेख में इलाज चलने लगा। डॉ ने उन्हें बच्चेदानी निकालने  का सुझाव दिया। लेकिन अभी तक वे बेऔलाद थे। इसलिए इसके उपचार के उपाय किये गए। कुछ खराब हिस्सा काट कर निकाल दिया गया। जिसके बाद बच्चेदानी में बीस टांके आये।
      अब मनमीत घर में रह कर आराम कर रही थी।हर  समय उसका मन  किस्मत के रंग बिरंगे खेल को समझने  में लगा रहता लेकिन  वह निराश नहीं हुई थी बल्कि इस हालात  को बदलने की कोशिश किस तरह की जा सकती है। इस बारे में सोचती रहती थी।
      सब ठीक होते ही वह  बच्चे के लिए नई तकनीकों का सहारा लेने लगी।  उसने testtube बेबी तकनीक से दो बच्चो को जन्म दिया। अब उसका घर खुशियों से महक उठा था। अब उसके चाचा जी दुनियाँ  से कूच  कर गए थे। चाची जी को उसने मदद के लिए अपने पास बुला लिया था।
      कुछ  समय बाद उसने स्वस्थ होते ही बच्चेदानी निकलवा दी। अब उसे इसकी जरूरत नहीं थी। उसके घर में बच्चो की किलकारियां गूँजने  लगी थी। बच्चेदानी का कैंसर फिर से पनपने लगे इससे अच्छा उसे निकलवाने में भलमनसाहत दिखाई दी।
      मनमीत का जीवन दुखो से भरा हुआ था लेकिन उसने अपने जुझारूपन से वह लड़ाई भी अपने हक़ में बदल दी।  उससे मिल कर जिंदगी जीने के प्रति मेरा नजरिया बदल गया।

     
          

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...