#INDIAN PARTY VS MONEY AND WASTE OR FOOD (PART 2)

         भारतीय दावते पैसे और खाने की बर्बादी( पार्ट 2 )

   पिछले भाग में दावतों में होने वाले खाने के बारे में जिक्र किया था। उस समय कुछ बाते आपसे  साझा करना  भूल गयी थी।उस तरफ आज में आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ. साधारणतया दावतों में खाने की बर्बादी होती है।
       आधुनिक युग  में लोग समय को बचाने  के लिए प्लेट  सिस्टम का उपयोग करने लगे है। मध्यम वर्ग की शादियों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है। जबकि पहले अमीर लोग इस विधि का उपयोग करते थे। आजकल परेशानी से बचने के लिए इसका प्रचलन बढ़ गया है। मे  इस तरीके के  कारण होने वाली परेशानी पर आपका ध्यान खींचना चाहती हूँ।
           अधिकतर लोगो को जानकारी नहीं होती कि इस सिस्टम में यदि आपने खाली प्लेट जिसमे  खाने का कोई सामान नहीं डाला है। साफ प्लेट गलती से झूठी प्लेटो के साथ रख दी तब भी उसका, मेजवान को खर्चा देना पड़ता है। इसमें खाने के हिसाब से नहीं बल्कि प्लेट के हिसाब से पैसा वसूला जाता है। यहाँ एक प्लेट की कीमत एक हजार से लेकर दस हजार तक हो जाती है। स्थान  और साये ( सीजन ) के हिसाब  से कीमत में अंतर  आता रहता है।
            मैने विवाहस्थल पर कई लोगो को एक ही दावत में कई  प्लेट लेते देखा है। यदि उनसे पूछो -'आपने ऐसा क्यों किया। "
     उनका जबाब सुनकर हैरान रह जाती  हूँ -"पहली थाली गन्दी हो गयी थी इसलिए थाली बदल ली। "
     यदि प्रत्येक दावत में हर इंसान कई प्लेट  खराब करे तो जरा सोच के देखिये मेजवान का   खर्चा कितना बढ़ जायेगा। वह ऐसे इंसान को देखकर क्या सोचता होगा।
        मान लो विवाह  में यदि पांच कार्यक्रम  (रोका ,सगाई, मेहदी,गोद भराई, रिसेप्शन  ) में  ऐसे इंसान को सपरिवार बुलाया जाये तो मेजवान का क्या हाल  होगा।
         ऐसे इंसान को टोके  तो उसका जबाब होता है -"खाया है तो क्या हुआ सगन भी तो देकर आये है। "
      आप एक बार सोच के देखिए कि  ऐसा इंसान चार लोगो को पांच कार्यक्रमों में ले जाकर कितना खर्च करवाता होगा और कितना सगन  देता होगा। खास सगे  सम्बन्धी भी सगन  देने के बारे में बढ़ कर बोलते अच्छे नहीं लगते क्योंकि शादियों में बहुत खर्चा होता है। जिसकी भरपाई सगन  देने से नहीं हो सकती।
        पहले समय में शादी में मेहमानो को गवाहों के तौर  पर बुलाया जाता था ताकि( दुष्यंत और शकुंतला )जैसा प्रकरण सामने नहीं आये। कोई शादी करके मुकर न जाये। लेकिन गवाहों का आना अब अनगिनत होता जा रहा है।
       पिछले दिनों  नोटबंदी के दिनों में मुझे एक आयोजन करना पड़ा। बैंकेट हाल  वालो ने बिल की रसीद एक चौथाई पैसो की बना कर दी जैसे 10 लाख खाने के बिल की रशीद केवल ढाई  लाख की थी।आयोजन पूरा होने तक मुझे डर लगता रहा कही ये आखिरी वक्त पर पैसे लेने से मुकर न जाये।  आप सोच के देखिये आज भी भारत में कितना भ्रस्टाचार पनप  रहा है। ये आयोजक कितनी काली कमाई करते होंगे उसे किस तरह बचाकर सफेद करते होंगे।
        पाकिस्तान में कितना भी  बड़ा ,रसूखदार अर्थात अमीर इंसान जब दावत देता है तब वह केवल एक डिश (पुलाव ) से मेहमानो का स्वागत करता है. उसमे किसी तरह का मीठा या विविधता की कोई गुंजाईश नहीं होती हे क्योंकि पाकिस्तान के कानून के हिसाब से खाने की बर्बादी करना गलत है। जिसके लिए दंड का प्रावधान है  .
      आप एक बार सोच कर देखिये दावतों में या लोगो की मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए या नहीं। ये  दिखावा कहाँजाकर  रुकेगा।

#INDIAN PARTY VS MONEY AND WASTE OF FOOD

         भारतीय दावते पैसे और खाने की बर्बादी 

     भारत में दावत का आयोजन करना बहुत महंगा हो गया है। पहले समय में सुख में अपने घनिष्ठ प्रियजनों को भोज दिया जाता था लेकिन अब उसका स्वरूप अति विशाल हो गया है। प्राचीन समय में बेटी को और उसके ससूराल वालो को खुश रखने के लिए दहेज और दावत का इंतजाम किया जाता था लेकिन आज उसका बृहद रूप सामने आता है। जहाँ पहले 50 और 100 लोगो के  भोज तक सिमित था अब वह हजारो ओर लाखो तक पहुंच चूका है। लोगो ने अभी सीमा निश्चित नहीं की है लोगो की संख्या कहा जाकर रुकेगी कहना मुश्किल है।
      लोग अपनी अमीरी दिखाने के चककर में पुरानी सीमाएं तोड़ते जाते है। जो शादिया पहले कुछ हजारो में तय हो जाती थी वह लाखो से खिसकती हुई करोड़ो रुपयों तक पहुंच चुकी है। ये अंतहीन क्रम कहाँ जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है।
     मेने अपने अमीर साथियो से शादी समारोह में होने वाले खर्चो की चर्चा की तो उसका जबाब सुनकर स्तब्ध रह गयी। उसके अनुसार ऐसे मौको पर ही तो दिखाने का मौका  मिलता  है। ऐसे समय में कंजूसी नहीं करनी चाहिए बल्कि दिल खोलकर खर्चना चाहिए। उनकी दरियादिली गरीबो को सारी जिंदगी पैसा जमा करने पर मजबूर कर देती है। भारतीय इस एक दिन की दाद की खातिर सारा जीवन अपनी इच्छाओ को मारता रहता है। इस दिन सारे जिंदगी की पूंजी लुटाने के बाबजूद आधे लोगो को खुश नहीं कर पाता। इस दिन सारी जमा -पूँजी खर्च  करने के बाद अपने को लुटा हुआ महसूस करता है।
      गरीबो के खाने में पूरी सब्जी और मीठा खाने को देकर इतिश्री समझ ली जाती थी अब दावत में अनगिनत खाद्य पदार्थ होते है। मध्यम वर्ग की शादियों में 100 खाद्य पदार्थ होना आम  बात हो गयी है। एक साधारण इंसान आमतौर पर 100 चम्मच खाना एक समय में नहीं खा सकता है। लेकिन मुफ्त का माल समझ कर हर चीज को खाने के लालच में प्लेट भर लेता है। उस खाने में बहुत अधिक घी और मसालो का इस्तेमाल होने के कारण उस खाने को कुछ चम्मच खाने के बाद उससे खाया नहीं जाता। उस भरी प्लेट को झूठन में फेंक देता है।
      भारत एक गरीब देश है यहाँ की जनता को दो वक्त भरपेट खाना नसीब नहीं होता है। उस देश में 40 % खाने की बर्बादी हो जाती हे। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार बंगलौर में जितने खाने की बर्बादी होती है उससे ढाई करोड़ लोगो का एक समय का पेट भर सकता है।ये सिर्फ एक शहर की बर्बादी है यदि पूरे भारत का आंकड़ा सुनोगे  तो यकीं करना मुश्किल हो जायेगा। इस देश में यदि खाने की बर्बादी रोक दी जाये तो किसी को भूखा न सोना पड़ेगा। किसी को आत्महत्या करने की जरूरत महसूस नहीं होगी। किसी के लिए उसकी बेटियाँ बोझ नहीं बनेगी।
      ये दिखावा अभी रुका नहीं है अमीर लोगो की शादियों मे कॉन्टिनेंटल ,थाई ,चायनीज़ आदि विविधता भरी हुई है। यदि आपको खाने की बर्बादी वाली जगह पर अगले दिन जाने का मौका मिलेगा तो जी घबराने लगता है। जो खाना रात के समय हमे ललचा  रहा था वही बिखरा हुआ ,बदबू मारता  खाना इस समय उलटी का कारण बन रहा है।
      आप एक बार इस बर्बादी पर विचार अवश्य करे। यदि इसे रोका जाये तो केसा रहेगा। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...