#LOTAS PARTY VS CLEANLINESS CAMPAIGN

        लोटा पार्टी बनाम सफाई अभियान 

  सफाई के बारे में सबसे पहले इसे हटाने के बारे में महात्मा गाँधी ने सोचा था। भारतीय समाज में विशेष वर्ग द्वारा सफाई करवाई जाती थी। इसके आलावा समाज के अन्य वर्ग शोर कितना भी मचा ले लेकिन अपने हाथ से सफाई के बारे में सोचते भी नहीं थे। लेकिन उस समय जब अछूत वर्ग को लेकर कटटरता व्याप्त थी। उनके कार्य को खुद करके गाँधी जी ने साहसिक कार्य किया था। कच्चे शौचालय को साफ करना बहुत मुश्किल होता  है। उसे करने से भी उन्होंने गुरेज नहीं किया।
      इसका कारण विदेश में रहना है। क्योंकि ब्रिटेन में वर्ग भेद नहीं था। वे काम करने वाले  को सम्मान देते थे। भारतीय सफाई का काम विशेष वर्ग को सौंपने के कारण गंदगी में भले रह लेते थे। लेकिन खुद कुछ नहीं करके राजी थे। लोग अमीरो से प्रेरणा लेकर दूसरो  पर निर्भर रहने लगे जिसके कारण हर तरफ गनदगी दिखाई देती थी। उनके इस आंदोलन ने लोगो में पड़ा गतिरोध तोड़ने का काम किया।
          गाँधी जी के बाद किसी अन्य नेता ने 70 सालो बाद सफाई की अलख जगाई। अब आपको भारत में सफाई के प्रति जागरूकता देखने को मिलेगी। सफाई को सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाता था।
          मेने वह वक्त भी देखा है जब सफाई कर्मचारी सरकारी नौकरी करते हुए संस्थान की सफाई करने की जगह मौहल्ले  की सफाई करके ज्यादा पैसे कमाने के जुगाड़ में लगे रहते थे।
       विद्यालयों का बहुत बुरा हाल  था। जब भी कर्मचारी से सफाई के लिए कहते थे वे सारा आरोप विद्याथियो पर डाल  कर  खुद को आरोपमुक्त साबित करने में लगे रहते थे। हर तरफ कूड़े का  अम्बार  लगा रहता था।
     उससे पहले हर कक्षा के विद्याथी खुद नंबर से झाड़ू लगाते  थे।सफाई कर्मचारियों का कार्य सिर्फ नाममात्र का होता था।
    बहुत सारा सामान अलमारियों में ऐसा रखा होता था जो किसी काम के लायक नहीं होता था लेकिन चार्ज का सामान है इसे कैसे फेंक दे। इसलिए अलमारियों में संभाल के रखा जाता था। उन अलमारियों को खोलते हुए भी बदबू आती थी। लेकिन मोदी जी के सफाई अभियान के तहत इस तरह के कूड़े को बाहर निकला गया। जिसके कारण बहुत सारी  अलमारियां खाली हुई। हमारे समान रखने की समस्या हल हुई
      नगर निगम में जितने कर्मचारी रजिस्टरों में होते थे उससे चौथाई कर्मचारी काम में लगे होते थे बाकि फर्जी होते थे जिनका पैसा बंदर बाँट  के हिसाब से उच्च अधिकारी बाँट लेते थे।  कही भी सफाई नजर नहीं आती  थी।           अब रेलवे प्लेटफार्म ,रेलगाड़ी में सफाई नजर आती  है। पहले घर से बाहर निकल कर गंदगी के कारण  अक्सर मन खराब हो जाता था।
       मेने वह समय भी देखा है। जब घरो में शौचालय,रसोईघर  और स्नानागार नहीं होते थे। लोगो को इनकी जरूरत महसूस नहीं होती थी। घरो में केवल कमरे बनवा कर  काम की इतिश्री समझ ली जाती थी। अक्षय कुमार की फिल्म टॉयलेट  देखकर औरतो की विवशता समझ में आयी। जहां औरतो को सात पर्दो में कैद रखने का रिवाज हो वहाँ इस मामले में खुलापन समझ से परे  है। नायक को  समाज से बगावत करके एक शौचालय बनवाने में  किस तरह मशक्क्त  करनी पड़ी।
      मोदी जी के सफाई अभियान के कारण लोग कूड़ा गलत जगह डालने से पहले सोचने लगे है। लोगो की रोकटोक का असर भी दिखाई देने लगा है। लोग सफाई को लेकर एकजुट होने लगे है।
        लोगो को कूड़े को खत्म करने का तरीका नहीं पता। इसके कारण कूड़े के पहाड़ खड़े हो गए है। इसको खत्म कैसे किया जाये इसका भी अभियान चलाया जाना चाहिए। जिससे हर इलाका जीरो गार्बेज बन जाये।
      यदि आप मेरे विचारो से सहमत है तो लाइक और शेयर कीजिये। 

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