दिवाली और पटाखे
दीवाली पर सुप्रीम कोर्ट की मनाही के बाबजूद लोगो ने बहुत ज्यादा पटाखे चलाये उन्हें देखकर लगता है लोगो को अपने स्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं है वे केवल दिखावे के आडम्बर में जान खोने से परहेज नहीं करते। उनको लगता हे यदि बीमार पड़ गए तो डॉ उन्हें ठीक कर देगा।शहरो में रहने वाले कई लाइलाज बीमारियो का शिकार हो रहे है जिसके कारण उन्हें ईश्वर की शरण में जाना पड़ता है। वे दुसरो को दोष देकर इतिश्री मान लेते है। जब हमने हवा, पानी,मिटटी आदि सब कुछ खराब कर दिया तो सबसे पहले साफ चीजों के लिए क्या दूसरी दुनिया या देश की शरण में जायेंगे।
अब तक हिंसा के मारे शरणार्थियों को कोई देश जगह देने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में पर्यावरण के मारे शरणार्थियों को अपने देश में कोन शरण देना चाहेगा। हालात बहुत ज्यादा ख़राब होने से पहले सोचना होगा। गाँधी जी के सफाई अभियान से पहले भारतीयों के बारे में विदेशी लोग गंदगी पसंद समझते थे। गाँधी जी ने सफाई के प्रति लोगो में जागरूकता जगाई थी। सभी को सफाई की महत्ता समझाई जिससे लोग अपने आसपास को स्वच्छ रखने लगे।लेकिन 70 सालो में उन्हें लोग भूल गए फिर से गंदगी के ढेर में दबने लगे उनके मरने के बाद मोदी जी ने स्वच्छता अभियान शुरू किया जिसका कुछ असर दिखाई देने लगा है। लेकिन नगरनिगम की आये दिन की हड़ताल के कारण सफाई अभियान को धक्का लगता है।
सफाई कर्मियों को मेहनताना नहीं मिलता तो खाली पेट कब तक काम करेंगे। कहने के लिए सरकारी नौकरी है लेकिन इसके बाबजूद हर महीने उन्हें दुसरो के सामने हाथ फैलाना पड़े कितना दुखदायी लगता है।
बरसो बाद मेने अपने आसपास कुछ पटाखे जलने में कमी देखी है। सप्रीम कोर्ट के आगे आने के कारण मुझे लगता हे लम्बे समय में लोगो के अंदर वातावरण और अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता आएगी। वे दुसरो को दिखाने के लिए पटाखे चलाने के बारे में सोचने लगेंगे। और नई पीढ़ी सिगरेट की तरह इनका बहिष्कार करेगी। वे दिखावे की जगह अच्छे स्वास्थ्य को महत्त्ब देंगे।
सरकार को पटाखे बंद करने के लिए इससे भी ज्यादा सख्त कदम उठाने पड़ेगे। लोग अपनी हठधर्मिता के कारण अपना और अपने आसपास के लोगो की जान को जोखिम में डालने से तभी परहेज करेंगे।
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