#amrika or atankvad

                           अमरीका और आतंकवाद 

  अमरीका में 11  सितंबर की घटना के बाद किसी आतंकवादी संगठन के द्वारा इतना बड़ा हमला करने की किसी के द्वारा हिम्म्त नहीं दिखाई गई। इसका कारण अमरीका ने अपने सुरक्षा तंत्र को बहुत ज्यादा मजबूत बना दिया। जिसके कारण सभी आतंकवादियों को समय से पहले ही पकड़ लिया जाता है। इस घटना के बाद अमरीका में हर स्थान पर cctv लगा दिए गए। छोटी से छोटी घटना उनसे  और अंतरिक्ष से नजर रखी जा रही है। 
     अमरीका की ये तकनीक बाहरी  लोगो को पकड़ सकती है लेकिन अंदर के दहशतगर्दो को कैसे पकड़े। अभी की घटना हमे सोचने पर मजबूर करती है। अमरीका के कानून में हथियारों  की खरीद पर कोई पाबंदी नहीं है.इसके लिए किसी तरह की कागजी कार्यवाही नहीं की जाती। इसके कारण वहाँ 88 % लोगो के पास हथियार है।
        पुराने समय में हथियारों की छूट लोगो के लिए जरूरी थी। क्योंकि वहाँ की मूल निवासियों से बचाव के लिए हथियारों की जरूरत थी। इतने बड़े इलाके में जंगली जानवरों से अपने आप को सुरक्षित रखने में हथियार सहायक थे। अब ऐसा  समय खत्म हो चूका है। चारो और अमन शांति है। 
     राष्ट्रपति   बराक ओबामा ने  हथियारों के ऊपर पाबन्दी लगाने के विचार पर उसके सांसद ही उसके खिलाफ हो गए। इसलिए उन्हें अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। लेकिन वहाँ शराब खरीदने के लिए उम्र की पाबंदी है। लेकिन हथियार कोई भी खरीद सकता है। 
      मानव में क्रोध की भावना बचपन से ही पाई जाती है। इसका में आपको एक उदाहरण देकर स्प्ष्ट करना चाहती हुँ। मेरे पड़ोस में पुलिस इंस्पेकटर रहते थे। उन्होंने अपनी 6  साल की बेटी को डांट  दिया। वह रोने लगी और माँ के पास जाकर बोली-" में पापा को गोली मार  दूँगी। पापा बहुत गंदे है। " उसकी माँ हैरान  रह गई। उसने इतने छोटे बच्चे से ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उसके बाद वे दफ्तर से पिस्तौल नहीं लाते  थे। यदि जरूरी होती थी तो लॉकर में रखते थे। हम इतने छोटे बच्चे से ऐसी  भावनाओ की कल्पना नहीं करते है। इससे बड़े बच्चे अपने क्रोध पर कैसे नियंत्रण रखेंगे सोच कर देखिये। 
       अमरीका में आतंकवादी घटनाओं से कम और मानसिक रोगियों के कारण बहुत ज्यादा मोते हो रही है। इसका उदाहरण आपको नार्वे , केलिफोर्निया ,पेरिस ओरलेंडो आदि  की घटनाओं में दिखाई दे जायेगा। यूरोपियन देशो में पारिवारिक ढांचा टूट रहा है लोगो के अंदर मनोवैज्ञानिक अवसाद पैदा हो रहा है। उससे सामना करने की ताकत उनमे नहीं है। वे अपने मन की बात किसी  से साझा नहीं कर पाते। इस  कारण अनगिनत लोगो को मार कर खुद भी मोत की गोद में चले जाते है। उनका अवसाद अनेक परिवारों के दुःख  का कारण बन जाता है। ओरलेंडो की दुर्घटना में अबतक 53  लोग मर चुके है पचपन से ज्यादा घायल अवस्था में अस्प्ताल्मे भर्ती है। वे जीवित रहेंगे  या अपंग के समान रहकर, इस दुःखद घटना  से कभी उबर नहीं पाएंगे।उन्हें हर तरफ मौत मड़राती दिखाई देगी। इस घटना के कारण वे सहज जीवन कभी जी नहीं सकेंगे। 
      हर तरफ isis का तांडव दिखाई दे रहा है। संसार के सभी देशो में मुस्लिम धर्म के लोग रहते है। मुस्लिम देश अपनी कटटरता के कारण  लगभग तबाही की और बढ़  रहे है। लेकिन जहाँ कम मुस्लिम रह रहे है उन पर isis के कटटर बाद के प्रचार ने इस कदर जड़े जमा ली है। कि उन्हें खून में रंगे लोग जिन्दा लोगो से जयादा मोहित कर रहे है। इस कटटर बाद के कारण आम मुस्लिमो को भी हम गुनहगार की तरह देखने लगे है।  
      बोस्टन के हमले में सरनिव भाइयो ने कत्लेआम मचाया तो दूसरी तरफ सरनीव जोड़े ने लोगो को मार कर अपने आक्रोश को शांत करके खुद को मिटा दिया। इस तरह के लोग जेहादियों के सामान अपने आप को ख़त्म करने में गुरेज नहीं करते। 
  इस तरह की घटनाओं के कारण दूसरे देशो में रहने वाले सिखो  को भी लोगो की नफरत का सामना करना पड़  रहा है। नेताओं और सिख मत को मानने वालो को आम जनता को समझाना पड़  रहा है हमारा धर्म उनसे अलग है।  
        अब आम मुस्लिम लोग भी अपने आपको कटटर आतंकवादियों से अलग साबित करने में लगे है। इसका उदाहरण -ओरलेंडो में रहने वाले मुस्लिम लोगो ने घायलों और मृत लोगो के लिए, सरकार को 107 करोड़ रूपये इक्क्ठे करके दिये है।
     किसी धर्म के लोगो को हजार साल पुरानी रिवायतों को आधुनिक समय में लागू करना कहाँ तक वाजिव है। परम्पराओ का दामन थामने के लिए मजबूर करना ठीक नहीं है। इंसान को वक्त के हिसाब से बदलने की कोशिश करनी चाहिए। हिंसा के द्वारा सभ्यताएं नष्ट होती है। इलाके वीरान होते है। रोने वालो के आंसू थमने का नाम नहीं लेते। जब हम किसी को जिंदगी दे नहीं सकते तो किसी की जिंदगी लेने का हक हमे कैसे मिल गया। इसका उदाहरण सीरिया और इराक के रोते  विलखते लोगो को देख कर लगता है। लोगो की खून की प्यास देशो को वीराने में बदल कर भी शांत नहीं हो रही।  

#adhunikta or safai

                                 आधुनिकता और सफाई 

 
 भारतीय सभ्यता अति प्राचीन सभ्यता कहलाती है।  हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता  में सफाई और नालियाँ  विकसित और ढकी हुई थी।  मोहनजोदड़ो की सभ्यता लगभग ८००० साल पुरानी  है। उसे शहरी सभ्यता कहा जाता है। 
       पुराने समय में सरकार की तरफ से सफाई का पर्याप्त बंदोबस्त नहीं किया जाता था बल्कि हर घर में कचरे का निपटान किया जाता था। आज आपको इस बात पर यकीन करना मुशकिल लग रहा होगा लेकिन हमारी भारतीय सभ्यता में  पशु -पक्षियों को समान महत्व दिया जाता था। रसोई  से निकलने वाले छिलके और  खाद्य -पदार्थ पशुओं के खाने के काम आते थे । कृषि के सहारे पशुओं को पालने में ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता था। . पशुओं के लिए अलग से कुछ जुटाना नहीं पड़ता था। उनके द्वारा दूध -घी घर का और शुद्ध मिल जाता था। 
     कुछ घरों में मुर्गिया और बतख पाली जाती थी। बकरी और सूअर के द्वारा उनकी मांसाहारी  जरूरतें पूरी हो जाती थी। उनके लिए कुछ अलग से इंतजाम नहीं करना पड़ता था। हमारे खाने में से ही उनका गुजारा हो जाता था। 
      आप अपनी दादी -नानी का समय याद करके देखिये उनके समय में हर रोज शहरो में भी एक गाय और कुत्ते की रोटी निकलती थी। पक्षियों के लिए भी दाना  डाला  जाता था। 
        आज अच्छे इलाको में जानवरों को रखना कोई पसंद नहीं करता जबकि कुत्ते अमीर  घरों की शोभा बढ़ा  रहे है। जानवर भी कचरा निपटाने में सहयोग देते है.आज .जब तक हरा भरा खाना जानवरों तक पहुंचता है तब तक वह सड़ चुका होता है। बदबू आने के कारण कोई उसे अपने जानवरों को खिला कर बीमार नहीं करना चाहता। 
         गाँव के घरों में शौचालय नहीं बनाये जाते थे बल्कि सभी गांवों  में शौच के लिए खेतों में  निश्चित जगह बना  दी जाती थी। गांव के सभी लोग वहाँ जाकर शौच करते थे। काफी समय तक ये वहाँ पड़ा  रह कर खाद में बदल कर   जमीन की पोषकता बढ़ाता  था। 
      प्राचीन समय में भारत की जनसंख्या बहुत कम थी। इस कारण कचरा निपटान बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। आपने अपने घरों में पूजा से सम्बंधित सामान नदियों में विसर्जित होते देखा होगा। उस ज़माने में जलीय जीव -जन्तुओ का ध्यान रख कर , पूजा सामग्री को किसी के द्वारा अपमानित होने से बचाने के लिए, उसे जल में जीव -जन्तुओ के उपयोग का साधन बना  दिया गया। लेकिन पूजा की सामग्री और मूर्तियाँ (प्लास्टर औफ  पेरिस ) इतनी अधिक संख्या में उपयोग होने लगी कि  उनके कारण नदियों का पानी  विषाक्त हो गया।
         पहले पूरे  इलाके में एक मंदिर या मूर्ति के द्वारा उत्स्व का आयोजन होता था लेकिन अब हर घर में मंदिर की स्थापना और बहुत सारे भगवान की मुर्तिया और हर बार मूर्तियों के बदले जाने के कारण उनका निपटान करना भी अब समस्या बन गया है। 
       भौतिकवादी सभ्यता के कारण जिंदगी दिखावा बन गई है। हम अपनी जरूरत से ज्यादा चीजों का प्रयोग करके समस्या पैदा कर रहे है। 
        अंग्रेजी सभ्यता के द्वारा हमने   इलाके की गंदगी, नालियों के द्वारा दूर ले जाकर नदी में बहा दी जाये सीखा । इतनी अधिक जनसंख्या की गंदगी जब नदियों में मिलने लगी तब नदियाँ  भी गंदे नाले में बदल गई। आप किसी भी मैदानी इलाके की नदी में जाकर नहाने की हिम्म्त नहीं जुटा  पाएंगे। हमें नहाने के लिए अब तालाबों की जरूरत महसूस होती है या साफ पानी की। आप दिल्ली में घूमने जायेंगे तब आपको  हर इलाके में गंदे नाले मिल जायेंगे जबकि नहाने लायक एक नदी खोजना मुश्किल है । 
        यदि हम सफाई का महत्व समझेंगे तभी अपने माहौल को साफ रख सकेंगे। हमें प्राचीन सफाई व्यवस्था को अपनाना पड़ेगा। हर इलाके का कूड़ा उसी इलाके में निपटाया जाये। उसे किसी दूर डम्पिंग यार्ड में फेंका ना  जाये बल्कि हर ढलाव में कूडे  से खाद बनाने के लिए साधन बनाए जाये। लोगो को वहाँ  से बनी हुई  खाद  उपयोग के लिए दी जाये। 
      लोगो को  घरों में गमलों में पोधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाये जिससे खाद का उपयोग हो सके। लोग अपने घरों में सब्जियों के पोधे लगा कर भारत की खाद्य समस्या से जूझने में भी सरकार की मदद कर  सकेंगे। हमें घर की साफ और बिना दबाई  वाली सब्जियां मिल सकेगी ,पैसो की बचत भी होगी ।  
       प्रत्येक इलाके में सरकार की तरफ से पशु -पक्षियों को पालने का केंद्र स्थापित किया जाये। जिससे उस इलाके का हरा कचरा तत्काल जानवरों तक पहुंचकर उपयोग किया जा सके।  हर इलाके और घर  में कचरा निपटान किया जा सकेगा । 
        जैविक कचरे से अलग दूसरे तरह के कचरे को रिसाइकिल करके निपटाया जा सकता है। 
      आप आज से 40  साल पहले का समय याद करके देखिये शहरो में  जितना कचरा आज एक घर से निकलता है उतना पहले 10  घरों में से भी नहीं निकलता था। हमें कचरे को समस्या बनाने की जगह उसका सही उपयोग करके कचरे की समस्या से निपटना चाहिए। तभी भारत "जीरो कचरा" कहला सकेगा। जबकि आज सभी भारत को गंदगी का ढेर समझते है। क्योंकि हमने सारे काम सरकार या दूसरों पर छोड़ दिए है। यदि हर इंसान जागरूक हो जाये तो कचरा निपटाना मुश्किल नहीं है  
        
  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...