#our health infrastructure

                                  हमारा स्वास्थ्य ढांचा 

         

      भारतीय परिवेश में भ्रष्टाचार हर तरफ फैला हुआ है। हम चाहते है सब ठीक हो जाये लेकिन उसे ठीक करने की जिम्मेदारी किसी अन्य की समझते है। हम अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं करना चाहते है। सब के मन में एक डर बैठा होता है। यदि कोई काम ठीक करने की कोशिश करेंगे तब हमे बहुत सारी  परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।हम उन आने वाली परेशानियों से बचना चाहते है।हम हर काम की जिम्मेदारी दुसरो की समझते है। एक इंसान सब कुछ ठीक नहीं कर सकता। 
      करोना  काल  में अधिकतर लोग पैसा कमाने में लगे रहे। जिसके पास दवाइयां थी ,ऑक्सिजन सिलेंडर, अस्पताल  में दाखिला सब पर लूट -खसोट  मची आपने देखी  होगी। अधिकतर लोगो का जमीर मर गया था। लाशो के ढेर पर महल बनाने में लोग लगे हुए है। 
       जब करोना  काल  में सरकार ने लोखड़ाऊं लगाया था। तब लोगो को सही तरह से इसका कारण समझ नहीं आया था। लेकिन आज के समय में हमारी जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई है। शहरों में हमारी स्वास्थ्य  सेवाएं कुछ ठीक है लेकिन गावो में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सही तरह से एक मकान  तक नहीं बना है। उसमे सामान तो विल्कुल नहीं है। कई जगह पर अस्पताल के नाम पर जो ढांचा खड़ा है। उसमे जानवर बंधे है,भूसा भरा हुआ है या उसमे ताला  लगा हुआ। बेसिक चीजे तक नहीं है  .गरीब। अनपढ़ जनता को आवाज उठाने पर डरा -धमका कर भगा दिया जाता है।
       राजीव गाँधी जी ने कहा  था-"अगर हम जनता के लिए एक रुपया भेजते है तो उनके पास केवल पंद्रह पैसे पहुंचते है। "  लेकिन  गावो के बंद  अस्पतालों में एक पैसा पहुँचता भी नहीं दिखाई देता है.
       सरकार     हर जगह की फोटो और विडिओ मंगवाती है। उसी तरह का ट्रेक प्रणाली इसके लिए भी बनवायी  जाये। ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था सही हो सके। 
      सरकार जितने मौत के आंकड़े बता रही है। विदेशी संस्थाएं  उससे दस या बीस  प्रतिशत जायदा बता रही है।  उस पर बहस भी हो रही है। यदि आपको मेरी बातो पर यकीन नहीं आ रहा तो अपने आस पास का माहौल देखिये जबकि हम  शहरो में रह रहे है। गावो की कल्पना कितनी भयावह होगी।  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...