आज का बनारस
धार्मिक नगरी बनारस में घूमते हुए अद्भुत अहसास हुआ। एयरपोर्ट से निकलते हुए चौड़ी और साफ सड़के देखकर समझ नहीं आ रहा था कि हम बड़े शहर में है या छोटे शहर में। बनारस प्राचीन शहर के साथ शिव की नगरी होने के कारण अनेक मंदिर का होना स्वाभाविक था। बनारस के बारे में अनेक किवदंती मशहूर है जैसे जिसकी मृत्यु यहाँ होती है या जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ जीवन और मृत्यु का मिलन साथ -साथ दिखाई देता है।घाटों पर घूमते समय शाम के 6 बजे हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट पर मेने लगभग 20 चिताए जलती देखी। हमेशा से सुना था दाहसंस्कार रात्रि में नहीं करना चाहिए अशुभ होता है। लेकिन इस धार्मिक नगरी में रात के अँधेरे में इतनी अधिक संख्या में दाह संस्कार देख कर मन विचलित हो गया। यहाँ पर लकड़ियों के अम्बार लगे हुए थे। चारो तरफ उसकी राख फैली हुई थी। रोते -विलखते लोग मन में विरक्ति का भाव पैदा कर रहे थे।
यहाँ के घाट बहुत बड़े थे। जिनपर बहुत बड़े कार्यक्रम किये जा सकते थे। इन्हे एक प्रकार से खुले हुए सभागार कह सकते है। में 25 दिसम्बर को यहाँ पहुंची थी। इस कारण भव्य आयोजन हो रहे थे। दशाश्वमेघ घाट का आयोजन मन को आह्लादित कर गया। बहुत अधिक भीड़ थी घाटों तक पहुंचने के रास्तो पर लोगो का जमघट देखकर समझ नहीं आ रहा था किस तरह आगे पहुंच सकेंगे। हमने एक रिक्शा रोका उसमे चढ़कर घाट तक पहुँचे। रिक्शा वाला जिस तरह लोगो की भीड़ में से रास्ता बना रहा था। उसकी चतुराई को दाद देने का मन कर रहा था।
मेने उत्तर प्रदेश के कई शहर देखे है लेकिन बनारस में सफाई का इंतजाम बहुत अच्छा लगा। जिस हिसाब से भीड़ थी उस हिसाब से गंदगी नहीं थी। हर दुकान वाले ने दुकान के सामने कूड़ेदान रखा हुआ था। कई दुकान वालो ने बीच सड़क पर भी कूड़ेदान रखे हुए थे। जिसके कारण हमें गंदगी दिखाई नहीं दी। चौड़ी सड़के दिन और रात दोनों समय साफ थी। बनारस में ऐसी सड़के भी है। जिनपर एक समय में केवल एक इंसान चल सकता है। ऐसी सड़को पर गंदगी दिखाई दी। मुझे लगता है इन सड़को तक सफाईकर्मियों और निरीक्षकों की पहुँच नहीं होने के कारण ऐसा हाल था।
काशी विश्वनाथ का मंदिर बहुत छोटी गलियों के बीच बना हुआ है। इन गलियों में दो लोग मुश्किल से चल सकते है जब में यहाँ पहुंची तब पंक्ति को देख कर मै भी खड़ी हो गई। वही दुकान वाले से प्रसाद भी ले लिया। मैने दुकान वाले से पूछा कितनी देर में नम्बर आ जायेगा। उसने कहा- आधे घंटे में आएगा।
कुछ समय में खड़ी रही। लेकिन लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी। मेने अपने साथी को खड़ा करके आगे जाकर देखा तो लाइन में कमसकम ५०० लोग दिखाई दिए। उस हिसाब से हम पूरे दिन में मुश्किल से मंदिर के दर्शन कर पाते। जबकि हमारा इरादा अन्य स्थानों को देखने का भी था।
हमने तीन सौ रूपये की टिकट लेकर दर्शन करने के बारे में सोचा। मेरे अंदर लाइनों में लगकर श्रद्धा भाव रखते हुए दर्शन करने की लालसा बिलकुल नहीं थी इसलिए हमने अंदर जाकर जल्दी से दर्शन किये। लेकिन लोगो के अंदर अदम्य भक्ति देखकर लग रहा था। इसका रख -रखाव सही नहीं है। साधारण मंदिर इससे ज्यादा भव्य है।इसे जीर्णोद्धार की जरूरत है।
